चंडीगढ़. पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा में पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (PGT) बनने के लिए हरियाणा शिक्षक पात्रता परीक्षा (HTET) या स्कूल शिक्षक पात्रता परीक्षा (STET) पास करने की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार विद्यार्थियों के हित में शिक्षकों के चयन के लिए न्यूनतम मानकों से अधिक योग्यता तय कर सकती है। वहीं, निजी शिक्षण संस्थानों में बिना सरकारी अनुदान वाले पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों की बहाली और सुविधाओं से जुड़े एक अलग मामले में भी कोर्ट ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं।

PGT भर्ती में HTET/STET क्यों जरूरी?

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) की 2014 की अधिसूचना में कक्षा 11वीं और 12वीं के शिक्षकों के लिए HTET या STET पास करना अनिवार्य नहीं बताया गया है। ऐसे में राज्य सरकार की ओर से यह शर्त लगाना केंद्रीय नियमों के विपरीत है।

जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस मिंदरजीत यादव की खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए अतिरिक्त पात्रता शर्तें तय कर सकती है।

PGT को 7वीं और 8वीं कक्षा भी पढ़ानी पड़ सकती है

कोर्ट ने कहा कि PGT शिक्षकों की जिम्मेदारी केवल 11वीं और 12वीं कक्षा तक सीमित नहीं है। वे 7वीं और 8वीं कक्षा को भी पढ़ाते हैं। शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए पात्रता परीक्षा जरूरी है। ऐसे में PGT पदों के लिए भी यह शर्त उचित है।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि NCTE के मानक न्यूनतम योग्यता तय करते हैं। विद्यार्थियों के हित में राज्य सरकार इससे अधिक योग्यता निर्धारित कर सकती है।

भर्ती नियमों में 67% पद सीधी भर्ती से

कोर्ट ने हरियाणा के 2012 के सेवा नियमों का भी उल्लेख किया। इन नियमों के तहत PGT के 67 प्रतिशत पद सीधी भर्ती और 33 प्रतिशत पदोन्नति से भरे जाते हैं।

कोर्ट के अनुसार, सीधी भर्ती में पात्रता संबंधी छूट देने से भेदभाव की स्थिति पैदा हो सकती है। हाई कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने की बात कही है।

निजी शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों की बहाली पर भी सुनवाई

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट निजी शिक्षण संस्थानों में बिना ग्रांट-इन-एड यानी सरकारी अनुदान वाले पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े एक अलग मामले पर भी विचार कर रहा है।

जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस मिंदरजीत यादव की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इसमें उठाए गए मुद्दों पर गहन विचार की जरूरत है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई छह महीने के भीतर तय की है और फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है।

कोर्ट के सामने तीन प्रमुख सवाल

1. क्या कर्मचारी को बहाल करने का आदेश दिया जा सकता है?

कोर्ट यह तय करेगा कि क्या किसी निजी शिक्षण संस्थान को ऐसे कर्मचारी को दोबारा नौकरी पर रखने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जिसका पद सरकारी अनुदान के दायरे में नहीं आता।

2. क्या अनुबंध से बाहर जाकर सुविधाएं मांगी जा सकती हैं?

दूसरा सवाल यह है कि बिना सरकारी अनुदान वाले पदों पर अनुबंध के आधार पर काम करने वाले कर्मचारी अपनी अनुबंध संबंधी शर्तों से आगे बढ़कर लाभ मांग सकते हैं या नहीं। साथ ही, क्या वे सरकारी सहायता प्राप्त पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों के समान सुविधाओं की मांग कर सकते हैं?

3. क्या सरकार को अनुदान देने का निर्देश दिया जा सकता है?

कोर्ट यह भी विचार करेगा कि क्या कोई कर्मचारी संबंधित पद के लिए सरकार को ग्रांट-इन-एड देने का निर्देश जारी करने की मांग कर सकता है।

फिलहाल, इस मामले में अंतिम फैसला नहीं आया है। हाई कोर्ट का निर्णय निजी शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच सेवा शर्तों से जुड़े विवादों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

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