हेमंत शर्मा, इंदौर। एक आत्महत्या… एक कथित सुसाइड नोट… और उस नोट पर किए गए हस्ताक्षर। शुरुआत में यही दस्तावेज कुछ युवकों को आत्महत्या के लिए उकसाने और कथित सूदखोरी के मामले में आरोपी बनाने का आधार बना। लेकिन जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, कहानी ने ऐसा मोड़ लिया कि जिस व्यक्ति के नाम से सुसाइड नोट पेश किया गया था, उसके अपने दस्तावेजों पर मौजूद हस्ताक्षरों ने ही उस नोट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए।

मामला मोटरसाइकिल शोरूम संचालक मनोज पटेल की आत्महत्या से जुड़ा है। मामले में पुलिस ने जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रमाणित नहीं पाया और खारिजी रिपोर्ट अदालत में पेश की। इसके बाद मृतक के परिजनों की ओर से दायर आपराधिक रिवीजन भी अदालत ने खारिज कर दी।

आत्महत्या के बाद मिला एक पन्ने का कथित सुसाइड नोट

अदालत में रखे गए मामले के मुताबिक, मनोज पटेल ने 30 जून 2021 को जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली थी। शुरुआत में लसूड़िया थाना पुलिस ने मर्ग कायम किया और पोस्टमार्टम कराया। घटनास्थल क्षिप्रा थाना क्षेत्र में होने के कारण आगे की कार्रवाई वहां की पुलिस ने की। मृतक के परिजनों ने पुलिस को एक डायरी, मोबाइल फोन, सल्फास की गोलियों की खाली डिब्बी, एक कथित सुसाइड नोट और हिसाब-किताब की डायरी उपलब्ध कराई। इसी कथित सुसाइड नोट के आधार पर दीपक जायसवाल, माखन जायसवाल, अनिल चौधरी सहित अन्य लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और ऋणियों के संरक्षण संबंधी कानून की धाराओं में मामला दर्ज किया गया।

फिर उठा सबसे बड़ा सवाल- हस्ताक्षर किसके हैं?

मामले में आरोपी पक्ष ने पुलिस के सामने सुसाइड नोट की लिखावट और हस्ताक्षर पर ही सवाल उठा दिए। आरोपियों की ओर से पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर मांग की गई कि कथित सुसाइड नोट और हिसाब-किताब की डायरी की लिखावट की वैज्ञानिक जांच कराई जाए। यहीं से मामले की जांच ने नया मोड़ लिया।

परिजनों से मांगे गए दस्तावेज, लेकिन नहीं मिले

पुलिस ने कथित सुसाइड नोट की लिखावट की तुलना करने के लिए मृतक की दूसरी लिखावट और हस्ताक्षरों वाले दस्तावेज मांगे। पुलिस के मुताबिक, परिजनों की ओर से ऐसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। इसके बाद पुलिस ने मृतक के मोटरसाइकिल शोरूम से जुड़े हायर परचेस एग्रीमेंट को दूसरे रास्ते से हासिल किया। ये दस्तावेज उन ग्राहकों से जब्त किए गए, जिन्हें कथित तौर पर मनोज पटेल ने अपने हाथ से लिखकर दिए थे। इसके बाद सुसाइड नोट, हिसाब-किताब की डायरी और हायर परचेस एग्रीमेंट को हैंडराइटिंग एक्सपर्ट के पास जांच के लिए भेजा गया।

हिंदी में साइन देखकर हुआ शक

जांच में सामने आए एक अहम बिंदु ने पूरे मामले को पलट दिया। पुलिस के मुताबिक, कथित सुसाइड नोट पर हिंदी में हस्ताक्षर थे। वहीं मृतक के बैंक के दस्तावेज, पैन कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेजों पर अंग्रेजी में हस्ताक्षर पाए गए। यानी सवाल सीधा था- अगर मृतक सामान्य तौर पर अंग्रेजी में हस्ताक्षर करता था, तो कथित सुसाइड नोट पर हिंदी में हस्ताक्षर क्यों? यही अंतर जांच का महत्वपूर्ण आधार बन गया।

हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट ने बढ़ाया संदेह

पुलिस के अनुसार, हैंडराइटिंग जांच में कथित सुसाइड नोट और हिसाब-किताब की डायरी की लिखावट एक ही व्यक्ति की पाई गई। लेकिन दूसरी तरफ मोटरसाइकिल के हायर परचेस एग्रीमेंट में मौजूद लिखावट को अलग व्यक्ति की लिखावट बताया गया। यानी जांच में यह सवाल और मजबूत हुआ कि सुसाइड नोट और हिसाब-किताब की डायरी लिखने वाला व्यक्ति वही नहीं था, जिसने मृतक के जीवनकाल में हायर परचेस एग्रीमेंट लिखे थे। इसी आधार पर पुलिस ने कथित सुसाइड नोट को संदिग्ध माना।

घटना के दिन आरोपी कहां थे? CDR ने भी दिया जवाब

जांच सिर्फ लिखावट तक सीमित नहीं रही। पुलिस ने आरोपियों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड यानी CDR और लोकेशन भी खंगाली। पुलिस के मुताबिक, घटना के दिन आरोपियों की लोकेशन अलग-अलग स्थानों पर मिली। किसी की लोकेशन बैतूल-हरदा, किसी की देवास, तो किसी की अलग जगह पाई गई। इससे पुलिस को आरोपियों की घटनास्थल पर मौजूदगी के संबंध में भी पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले।

पुलिस ने अदालत में पेश कर दी खारिजी रिपोर्ट

जांच के बाद पुलिस ने अदालत के सामने निष्कर्ष रखा कि कथित सुसाइड नोट संदेहास्पद है और आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। इसके बाद पुलिस ने खारिजी रिपोर्ट अदालत में पेश की। अदालत ने पुलिस की रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण किया और आरोपियों को मामले से मुक्त कर दिया।

परिजन पहुंचे सेशन कोर्ट, लेकिन रिवीजन भी खारिज

मृतक के परिजनों ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सेशन कोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दायर की। आरोपी पक्ष की ओर से अधिवक्ता कृष्ण कुमार कुन्हारे और ईश्वर प्रजापति ने पैरवी की। बचाव पक्ष ने अदालत के सामने सुसाइड नोट के हस्ताक्षर, उसकी तारीख, हैंडराइटिंग रिपोर्ट और आरोपियों की घटना के समय की लोकेशन को महत्वपूर्ण आधार बताया।

कोर्ट ने माना- पुलिस की जांच में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं

सेशन कोर्ट ने केस डायरी और उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन किया। अदालत ने मृतक के परिजनों की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों को संदेह की स्थिति पैदा करने वाला माना और आपराधिक रिवीजन खारिज कर दी। अदालत ने यह भी माना कि पुलिस की ओर से लिया गया निष्कर्ष आरोपियों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से तैयार किया गया हो, ऐसा मानने का आधार नहीं है। इस तरह कथित सुसाइड नोट से शुरू हुआ मामला आखिरकार हस्ताक्षर, हैंडराइटिंग रिपोर्ट और लोकेशन के सवालों तक पहुंचा और अदालत ने आरोपियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई की मांग को स्वीकार नहीं किया।

एक हस्ताक्षर ने बदल दी पूरी कहानी

इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू यही रहा कि कथित सुसाइड नोट पर हिंदी के हस्ताक्षर और मृतक के दूसरे आधिकारिक दस्तावेजों पर अंग्रेजी के हस्ताक्षर के बीच अंतर ने जांच की दिशा बदल दी। जहां शुरुआत में सुसाइड नोट के आधार पर कई लोगों पर गंभीर आरोप लगे, वहीं बाद की जांच में उसी नोट की प्रमाणिकता सवालों के घेरे में आ गई। अंततः अदालत में आरोपियों के खिलाफ मामला आगे नहीं बढ़ सका और मृतक के परिजनों की आपराधिक रिवीजन भी खारिज हो गई।

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m