Dharm Desk :- कुंडली नौ ग्रह व्यक्ति के जीवन, स्वभाव, कर्म और भाग्य पर गहरा प्रभाव डालते है। यदि कुंडली में गहो की चाल अनुकूल है तो व्यिक्त के सभी काम बनते चले जाते हैं। लेकिन यदि कोई भी ग्रह कमजोर है, तब दिक्कते शुरू हो जाती है। ऐसे में नवग्रहों की शांति के लिए मंत्र जाप की परंपरा सदियों पुरानी है। सूर्य से लेकर केतु तक हर ग्रह के लिए अलग-अलग जाप संख्या बताई है। पर सवाल ये उठता है कि क्या ग्रहों के मंत्र जाप के लिए पुरोहित की सहायता लेना जरूरी है या व्यक्ति घर पर स्वयं भी ये साधना कर सकता है?

अब जाते हें कि मंत्र जाप के नियम, 9 ग्रहों की निर्धारित संख्या और हवन का विधान किस तरह होता है। इसके लिए सबसे पहले यह जान लें मंत्र जप के लिए हर बार पुरोहित को बुलाना अनिवार्य नहीं है। व्यक्ति अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार घर पर भी नियमित मंत्र जप कर सकता है। हालांकि, जब ग्रह शांति के लिए विशेष अनुष्ठान कराया जाता है। जिसमें संकल्प, निर्धारित संख्या में जाप, हवन और अन्य धार्मिक प्रक्रियाएं शामिल हों, तो योग्य आचार्य का मार्गदर्शन लेना उपयोगी होता है। मंत्र जाप करते समय इस बात का ध्यान रहे शुद्धता, एकाग्रता और सही उच्चारण जरूरी है। साधना शुरू करने से पहले संकल्प लेना चाहिए और नियमित रूप से जाप करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेष अनुष्ठान में संबंधित मंत्र और पूजा पद्धति की जानकारी होना जरूरी है।

9 ग्रहों के लिए कितने मंत्र जाप का विधान है

ज्योतिषीय परंपरा में नवग्रहों के लिए अलग-अलग मंत्र जाप संख्या बताई जाती है। प्रचलित विधान के अनुसार इनकी संख्या इस प्रकार है।
सूर्य: 7,000 मंत्र जाप
चंद्रमा: 11,000 मंत्र जाप
मंगल: 10,000 मंत्र जाप
बुध: 9,000 मंत्र जाप
गुरु: 19,000 मंत्र जाप
शुक्र: 16,000 मंत्र जाप
शनि: 23,000 मंत्र जाप
राहु: 18,000 मंत्र जाप
केतु: 17,000 मंत्र जाप
इन संख्याओं को ग्रह शांति के अनुष्ठानों में प्रचलित जाप संख्या के रूप में बताया जता है। अलग-अलग ग्रंथों और पूजा पद्धतियों में विधान का अंतर हो सकता है।

कलियुग में चार गुना जाप करने की क्या मान्यता है

कलियुग के प्रभाव को देखते हुए मूल जाप संख्या का चार गुना जाप करने की बात कही जाती है। इसे ‘कलौ चतुर्गुणम्’ से जोड़कर समझाया जाता है। साधक को अनुष्ठान की विधि और जाप संख्या के बारे में योग्य आचार्य से सलाह लेनी चाहिए। नवग्रह अनुष्ठान में मंत्र जाप पूरा होने के बाद दशांश हबन करने का विधान प्रचलित है। इसका अर्थ है कि जितने मंत्रों का जप किया गया है। उसकी 10वीं संख्या के बराबर आहुतियां दी जाती हैं। उदाहरण के लिए, 10 हजार मंत्र जाप करने पर 1 हजार आहुतियों का दशांश बनता है। हवन के बाद सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य, ब्राह्मण भोजन या जरूरतमंदों की सहायता करने की परंपरा को करना चाहिए। इस तरह मंत्र जाप, हवन और सेवा को अनुष्ठान की महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं के रूप में देखा जाता है।