कुमार इंदर, जबलपुर। मध्य प्रदेश की राजनीतिक राजधानी कहे जाने वाले जबलपुर में कांग्रेस से नाता तोड़कर बीजेपी का दामन थामने वाले नेताओं की ‘घर वापसी’ की राह आसान नजर नहीं आ रही है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि बीजेपी छोड़कर आने वालों को अब पैराशूट एंट्री नहीं मिलेगी, बल्कि इसके लिए कड़े राजनीतिक इम्तिहान से गुजरना होगा।
क्या है नया नियम?
जिला समन्वयक समिति की हरी झंडी: कांग्रेस साफ कर चुकी है कि अब किसी भी नेता की सीधे ऊपर से या बिना स्थानीय जांच-परख के वापसी नहीं होगी। सबसे पहले जिला समन्वयक समिति इस पूरे मामले पर मंथन करेगी। जो लोग बीजेपी से कांग्रेस में वापस आना चाहते हैं, उनका प्रस्ताव समिति में रखा जाएगा। समन्वय समिति उसके वापसी पर यदि सर्वसम्मति से मुहर लगाती है तो फिर इसका प्रस्ताव आगे भेजा जाएगा। समिति इस पर आपत्ति दर्ज करती है तो फिर कांग्रेस में उसकी वापसी नहीं होगी।
कांग्रेस नगर अध्यक्ष शौरभ नाटी शर्मा ने कहा कि, समन्वय समिति इस बात को भी देखेगी कि कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने वाले की स्थिति क्या थी, किन परिस्थितियों में वो बीजेपी में गया था और किन स्थितियों में वह आना चाहता है। इन सारे बिंदुओं पर मंथन किया जाएगा उसके बाद ही उसकी घर वापसी पर कोई निर्णय लिया जाएगा।
लोकल लेवल पर ‘ओके’
जब तक जिला स्तर पर नाम को हरी झंडी नहीं मिलेगी, तब तक वापसी का रास्ता साफ नहीं होगा। कांग्रेस नगर अध्यक्ष शौरभ शर्मा ने दो टूक शब्दों में कहा कि, जिला समन्वय समिति की बैठक में चर्चा के बाद ही अंतिम निर्णय के लिए मामला भोपाल भेजा जाएगा।
बीजेपी का क्या है रुख?
इस पूरे घटनाक्रम पर जब प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री राकेश सिंह से सवाल किया गया, तो उन्होंने बहुत सधा हुआ बयान दिया। मंत्री राकेश सिंह का कहना है कि जो लोग बीजेपी से जुड़े हैं, वे पार्टी की नीति, रीति और उसके नेतृत्व की दिशा से जुड़े हैं।
नेताओं की खामोशी बयां कर रही है सियासी बेचैनी
सूत्रों के मुताबिक, जो नेता भाजपा का दामन छोड़कर दोबारा कांग्रेस में लौटने का मन बना चुके हैं, वे अब इस पूरी प्रक्रिया के बाद खुलकर बोलने से बच रहे हैं। मीडिया के सामने चुप्पी साध चुके इन नेताओं की बेचैनी साफ तौर पर बताती है कि जिला समन्वय समिति की यह कसौटी उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
जबलपुर कांग्रेस का यह रुख साफ संकेत देता है कि पार्टी अब उन नेताओं के लिए अपने दरवाजे आसानी से नहीं खोलेगी, जो चुनाव या अपने सियासी फायदे के हिसाब से दल बदलते रहे हैं। अब देखना यह होगा कि जिला समन्वय समिति की इस बैठक में किस-किस के नाम पर मुहर लगती है और भोपाल तक किसकी फाइल पहुंच पाती है।

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