“Nature does not hurry, yet everything is accomplished.” विश्व शाकाहारी दिवस, 1 अक्टूबर, आज का यह दिन भोजन की पसंद पर विचार करने के अलावा इस विचार का भी अवसर है कि हमारी थाली हमारे स्वास्थ्य, प्रकृति और जीव-जगत से किस प्रकार जुड़ी है। साल 1977 में North American Vegetarian Society ने इस दिन की शुरुआत की थी और 1978 में International Vegetarian Union ने इसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता दी थी । शाकाहार का मूल भाव “क्या खाएं” से ज़्यादा “कैसे जिएं” से जुड़ा है। फल, सब्जियां, अनाज, दालें, मेवे और अन्य पौध-आधारित खाद्य पदार्थ संतुलित रूप से लिए जाएं तो इनसे भी शरीर को आवश्यक पोषक तत्व और पर्याप्त फाइबर मिल सकता है।भोजन में संतुलन वज़न और पाचन को बेहतर रखने, हृदय और चयापचय संबंधी स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है। अँग्रेज़ी में इसके लिए कहा गया है “Let food be thy medicine.” जिसका भाव पूर्ण आश्य है उचित और संतुलित भोजन स्वास्थ्य का आधार बन सकता है।

एक प्रसिद्ध संस्कृत के श्लोक “युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥” का आश्य है जिनका आहार-विहार, कर्म, निद्रा और जागरण संतुलित है उसके लिए योग और सात्विक भोजन दुःखों को दूर करने वाला बनता है। “अहिंसा परमो धर्मः।” भी कहता है अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है क्योंकि जीवों के प्रति करुणा जीवन को अधिक संवेदनशील बनाती है। ‘करुणा’ शाकाहार का ही वकालत करती है । जब हमारी थाली में प्रकृति के प्रति संवेदना आती है तो जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण और भी मानवीय बन सकता है।

“You are what you eat.” इसी तरह से संस्कृत में एक श्लोक है “आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। अलग अलग भाषाओं में लिखी इन दोनो पंक्तियों का संदेश एक ही है कि जैसा भोजन होता है वैसा ही शरीर बनता है और वैसा ही जीवन और मन पर उसका प्रभाव पड़ता है।


पानी और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर पौध-आधारित भोजन का पर्यावरणीय प्रभाव कई परिस्थितियों में अपेक्षाकृत कम होता है। “A healthy outside starts from the inside.” स्मरण रहे बाहरी स्वास्थ्य की शुरुआत भीतर से होती है। शाकाहार को केवल आहार न मानकर स्वास्थ्य, संयम, करुणा और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी के रूप में समझना अधिक श्रेयकर होगा। हमारे भोजन की थाली का काम केवल उदर पोषण ही नही है बल्कि वह हमारे विचारों को भी आकार देने का काम करती है।

“Nature does not hurry, yet everything is accomplished.” इसका अर्थ संक्षेप में यही है कि प्रकृति हमें संतुलन, संयम और धैर्य का संदेश देती है। हमारी थाली में यदि स्वाद, स्वास्थ्य, संतुलन, संयम और करुणा भी शामिल हो जाए तो शाकाहार एक संवेदनशील जीवन-दृष्टि बन सकता है।

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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