“It is never too late to mend.” पापों पर अंकुश लगाने वाला ‘पापांकुशा’ का वास्तविक उद्देश्य अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों को पवित्र बनाना है। भगवान की भक्ति के साथ अपने आचरण को सुधारना ही पापांकुशा एकादशी का वास्तविक संदेश है। आत्मशुद्धि, पश्चाताप, सदाचार और भक्ति का संदेश देने वाली पापांकुशा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है, आज ही है वह पावन तिथि।‘पापांकुशा’ से जुड़ी एक पौराणिक कथा है जिसके पात्र ‘क्रोधन बहेलिया’ से सभी आसानी से जुड़ जाते हैं। वह कथा है, विंध्याचल पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था।इस बहेलिया का सम्पूर्ण जीवन हिंसा, लूटपाट, मद्यपान और बुरे कर्मों में बीता।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
इसका अर्थ है जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश करता है इसके विपरीत जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए कहा जाता है सदाचार और धर्म का पालन करना चाहिए।
मृत्यु निकट आने की सूचना पर भयभीत बहेलिया, महर्षि अंगिरा की शरण में पहुंचकर अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा था। ऋषि ने उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत करने और भगवान विष्णु की आराधना करने का मार्ग बताया था। क्रोधन बहेलिया की यह कथा सिखाती है कि जब मनुष्य को अपनी गलतियों का बोध हो जाए और वह सच्चे मन से सुधरने का संकल्प ले तो उसके जीवन में परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है। “It is never too late to mend.” इस पंक्ति का आश्य है ‘सुधार करने के लिए कभी देर नहीं होती’।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥ इसका अर्थ है दुष्कर्म में डूबा हुआ कोई व्यक्ति, अनन्य भाव से भगवान की भक्ति करने लगे और अपना संकल्प सुधार ले तो समाज को भी उसके परिवर्तन को महत्व देना चाहिए।
आध्यात्मिक दृष्टि से पापांकुशा का यह व्रत मन पर नियंत्रण, इंद्रियों पर संयम और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक है। धार्मिक दृष्टि से भगवान विष्णु की पूजा, जप, ध्यान, दान और सेवा इस व्रत का महत्वपूर्ण अंग हैं। सामाजिक दृष्टि से यह व्रत हमें हिंसा, छल, लोभ और अन्याय छोड़कर करुणा, सत्य और परोपकार अपनाने की प्रेरणा देता है।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। अमृतबिंदु उपनिषद् के इस प्रचलित वचन का अर्थ है मनुष्य का मन ही उसके बंधन और मुक्ति का कारण बनता है। मन को बुरे विचारों से हटाकर अच्छे विचारों में लगाना आवश्यक है।
पापांकुशा एकादशी का दर्शन स्पष्ट है “A good conscience is a soft pillow.” अर्थात् निर्मल अंतरात्मा मनुष्य को सुकून देती है।अतीत की भूलें हमारी अंतिम पहचान नहीं हैं। सच्चा पश्चाताप, अच्छे कर्मों में दिखाई दे तभी उसे सार्थक कहा जा सकता है।
पापांकुशा एकादशी जैसे व्रत का वास्तविक फल अपने भीतर के क्रोध, लोभ, हिंसा, छल और अहंकार को नियंत्रित करने में है। भगवान विष्णु की आराधना तभी जीवन को सार्थक बनाती है जब भक्ति साथ सत्य, करुणा, सेवा और सदाचार भी जुड़े हों।स्मरण रहे पश्चाताप हमें अपनी भूल दिखाता है, भक्ति हमें संबल देती है और सत्कर्म हमें सुधार की दिशा में आगे बढ़ाते हैं।

संदीप अखिल
सलाहकार संपादक
न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम
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