भारतीय संस्कृति की महान परंपरा का हिस्सा है ‘पितृ तर्पण’. अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का एक अवसर है ‘तर्पण’ जिसका अर्थ ही है श्रद्धापूर्वक संतुष्ट करना. Honor your parents, and your children will honor you. अँग्रेज़ी की इस पंक्ति के तार भी हमारी इस संस्कृति से जुड़े हुए हैं. धार्मिक मान्यता कहती है पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण कर जल, तिल, पुष्प और अन्न अर्पित करने से उन्हें शांति और संतुष्टि की प्राप्ति होती है. इसके अलावा भी पितृ तर्पण एक धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने की धार्मिक प्रक्रिया भी है .

तैत्तिरीय उपनिषद् के संस्कृत सुभाषित मातृदेवो भव. पितृदेवो भव. का अर्थ है माता और पिता को देवतुल्य मानो. “We stand on the shoulders of those who came before us…” कितनी सही बात लिखी है इस पंक्ति में “हम उन लोगों के कंधों पर खड़े हैं जो हमसे पहले इस संसार में आए.” ज्ञात हो मनुष्य की वर्तमान उपलब्धियाँ केवल उसके अपने प्रयासों का परिणाम नहीं होतीं उसके पीछे उनके माता-पिता, दादा-दादी, पूर्वजों, गुरुजनों और समाज के उन लोगों का योगदान होता है. वे सभी आपकी सफलता के हिस्सेदार हैं जिन्होंने अपने अनुभव, संघर्ष, ज्ञान और संस्कारों से आपके लिए रास्ता बनाया है. कभी यह भी सोंचें हम आज जहाँ भी पहुँचे हैं वहाँ तक पहुँचने में पिछली पीढ़ियों की मेहनत और त्याग की कितनी भूमिका है. अपनी सफलता पर गर्व करने के साथ ही साथ उन पुरखों के प्रति भी कृतज्ञ होना आवश्यक है जिन्होंने हमें आधार तैयार कर के दिया है.

आपके सभी संस्कार, परिवारिक परंपराएं, मूल्य और विरासत के पीछे अनेक पीढ़ियों का योगदान होता है. अँग्रेज़ी में कहावत है “A family is a little world created by love…” यानी “परिवार प्रेम से निर्मित एक छोटी-सी दुनिया है.” परिवार केवल एक घर में साथ रहने वाले लोगों का झुंड नहीं है. परिवार वह आश्रय है जहाँ प्रेम, विश्वास, अपनापन, सुरक्षा और भावनात्मक सहारा मिलता है. दुनिया चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, परिवार अपने सदस्यों के लिए एक ऐसी छोटी सी दुनिया बनाता है जहाँ सारे सुख-दुःख साझा किए जाते हैं और एक-दूसरे के लिए खड़े होने का भाव रखा जाता है. धन-संपत्ति से घर बड़ा बन सकता है लेकिन प्रेम, सम्मान और संस्कार से ही परिवार खुश और सुखी रह सकता है . तर्पण हमें याद दिलाता है कि हम अकेले नहीं हैं हमारे अस्तित्व के पीछे हमारे माता-पिता, दादा-दादी और अनगिनत पूर्वजों का त्याग और संघर्ष है.

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥

संस्कृत के इस श्लोक का अर्थ है जो सदैव बड़ों का सम्मान और सेवा करता है उसकी आयु, विद्या, यश और बल बढ़ता हैं.

मातु पिता गुरु प्रभु कै बानी।
करहिं सादर सकल सयानी॥

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकांड से उद्धृत इस चौपाई का अर्थ है माता-पिता और गुरु की वाणी का समझदार लोग आदरपूर्वक पालन करते हैं. सामाजिक दृष्टि से भी यह परंपरा परिवार को जोड़ती है. तर्पण नई पीढ़ी को अपने वंश, परंपरा और पारिवारिक मूल्यों से परिचित कराने का यह सुंदर माध्यम है. तर्पण के साथ निर्धनों, जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान देना सेवा और परोपकार की भावना को मजबूत करता है. सच्चा पितृ तर्पण केवल जल अर्पित करना नहीं होता बल्कि पूर्वजों के अच्छे संस्कारों को अपने आचरण में उतारना भी आदर्श तर्पण है और यही पुरखों के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी. “Remember the past, live the present, and build the future.” तर्पण के माध्यम से अतीत को याद रखें, वर्तमान को जिएँ और भविष्य का निर्माण करें.”

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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