जीवन सूक्त : विरोध और विद्रोह के बीच का अंतर इतना महीन होता है कि मनुष्य स्वयं भी नहीं समझ पाता कि वह अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रहा है या भावनाओं, स्वार्थ और प्रतिशोध के वशीभूत होकर किसी बड़ी टकराहट की नींव रख रहा है। विवेक, संवाद और नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा इसी बिंदु पर होती है। अंग्रेज़ी की एक प्रसिद्ध कहावत है “Forethought is better than afterthought.” जिसका अर्थ स्पष्ट है कि पहले से विचार करना, बाद में पछताने से बेहतर है।

परिवार हो, समाज हो, संस्थान हो,कार्यालय हो या राजनीति का मैदान। हर व्यक्ति को अपनी बात कहने, किसी की गलतियों पर प्रश्न उठाने और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करने का अधिकार है।सहमति-असहमति एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। समाज की, परिवार की और राष्ट्र के लोकतंत्र की यही सुंदरता है कि यहाँ विरोध को उपयुक्त स्थान मिलता है।

सुनु सठ भेद होइ मनुराई।
सुर नर मुनि सब करिअ भलाई॥

गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस के लंकाकाण्ड से ली गई इस चौपाई का सरल अर्थ है कि मूर्ख रावण सुनो, जहाँ देवता, मनुष्य और मुनि सभी समाज की भलाई के लिए एकजुट हों, वहां भेदनीति काम नहीं करती। यह प्रसंग इस तथ्य को बल देता है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वालों में फूट डालना असंभव होता है। इतिहास साक्षी है कि अनेक सामाजिक सुधार आंदोलनों ने अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं का विरोध करके समाज को नई दिशा दी है।

लेकिन जब विरोध का उद्देश्य समाधान के बजाय केवल सत्ता, प्रतिष्ठा या व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति बनने लगे, संवाद की जगह गोपनीय षड्यंत्र, छल और विश्वासघात लेने लगें तब परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है। “Beware of Greeks bearing gifts.” यानी हर सद्भावना के प्रदर्शन को बिना परखे स्वीकार न करें।

नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥

चाणक्य नीति के इस श्लोक के अनुसार मनुष्य को आवश्यकता से अधिक सीधा या सरल नहीं होना चाहिए। किसी जंगल में जाकर देखें तो पाएँगे कि जो पेड़ सीधे होते हैं, उन्हें लोग काट लेते हैं, जबकि टेढ़े-मेढ़े (कुब्ज) पेड़ वैसे ही सुरक्षित खड़े रहते हैं। “The truth will out.” सत्य अंततः सामने आ ही जाता है।इसमें सच्चाई है कि हर विरोध विद्रोह नहीं होता और हर विद्रोह षड्यंत्र नहीं होता मगर बदलते समय को देखते हुए इसे पहचानने का गुर हर एक को अपने भीतर पैदा होगा। अन्याय का विरोध इतिहास में बहुत से सुखद परिवर्तन का माध्यम भी बना है। इसलिए किसी असहमति को केवल असुविधाजनक होने के कारण कुचलना भी ठीक नही है।

“A word to the wise is enough.” यानी समझदार व्यक्ति के लिए संकेत ही पर्याप्त होता है। निर्दोष असहमति और विरोध का उत्तर धैर्य और संवाद से दिया जाना चाहिए लेकिन यदि इसमें षड्यंत्र या विद्रोह की बू आए तो उसका सामना निष्पक्ष जाँच, पारदर्शिता और कानून के माध्यम से हो। विरोध को दबाया नही जाना चाहिए मगर षड्यंत्र जनित विद्रोह को प्रमाणों के आधार पर उभरने भी नही देना चाहिए। यही विवेकपूर्ण समाज, सशक्त नेतृत्व और स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। “An ounce of prevention is worth a pound of cure.” यानी थोड़ी-सी सावधानी आने वाले बड़े संकट से बचा सकती है।

परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥

चाणक्य नीति के इस श्लोक के आधार पर कहा गया है ‘जो सामने मीठी बातें करे लेकिन पीठ पीछे काम बिगाड़े, ऐसे मित्रों से दूर रहना चाहिए। वह ऊपर से दूध मगर भीतर से विष से भरे घट के समान है। “Forewarned is forearmed.” अर्थात् पहले से सतर्क व्यक्ति संकट का सामना करने के लिए बेहतर तैयार रहता है।

आर्थिक क्षेत्र में कर्मचारियों के असंतोष की सुध लेना उस संस्थान को मजबूत बनाता है, सामाजिक जीवन में संवाद, संबंधों को टूटने से बचाता है और राजनीति में स्वस्थ विपक्ष लोकतंत्र को जीवंत रखता है। आवश्यकता इस बात की है कि भावनाओं से ऊपर उठकर व्यक्ति के शब्दों, उनके उद्देश्यों, आचरण और प्रमाणों को भली भाँति परखा जाए।

संदीप अखिल

सलाहकार संपादक

न्यूज़24 मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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