ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उसे संक्रांति कहा जाता है. जब सूर्य गुरु की राशियों धनु या मीन में प्रवेश करते हैं, तब खरमास लगता है. जिसे मलमास भी कहा जाता है. हिंदू धर्म में इसे शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त समय नहीं माना जाता, जबकि पूजा-पाठ, जप-तप और दान के लिए यह अवधि विशेष मानी जाती है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार 15 मार्च से खरमास शुरू हो चुका है. सूर्य के 13 अप्रैल को मेष राशि में प्रवेश करने पर यह समाप्त होगा. इस दिन को मेष संक्रांति कहा जाता है. इसके बाद फिर से मांगलिक कार्य शुरू किए जा सकते हैं और 20 अप्रैल से विवाह के शुभ मुहूर्त उपलब्ध होंगे.

त्रिग्रही योग बनेगा
ज्योतिष के अनुसार इस समय मीन राशि में शुक्र और शनि पहले से विराजमान हैं. सूर्य के प्रवेश से त्रिग्रही योग बनेगा. इसका प्रभाव कुछ राशियों पर सकारात्मक माना गया है. मिथुन, तुला, वृषभ, कर्क, कन्या और मीन राशि के जातकों को आर्थिक लाभ, मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में वृद्धि होने की संभावना बताई गई है.
मांगलिक कार्य वर्जित
धार्मिक मान्यता के अनुसार खरमास के दौरान ग्रहों की शुभ दृष्टि का प्रभाव कम हो जाता है. इसी कारण विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, उपनयन और अन्य मांगलिक कार्यों को टालने की परंपरा है. नए व्यापार की शुरुआत भी इस अवधि में नहीं करने की सलाह दी जाती, क्योंकि इसके परिणाम अनुकूल नहीं माने जाते.
खरमास में क्या ना करें
शास्त्रों में बताया गया है कि इस अवधि में भगवान, गुरु, माता-पिता, गाय और स्त्री की निंदा नहीं करनी चाहिए. घर के द्वार पर आए जरूरतमंद को खाली हाथ वापस नहीं भेजना चाहिए. ऐसा करना अशुभ माना गया है और इससे जीवन में आर्थिक व शारीरिक समस्याएं आने की मान्यता है. इन दिनों में नए वाहन या घर खरीदने से भी परहेज करने को कहा जाता है. साथ ही विवाद और झगड़ों से दूर रहने की भी सलाह दी गई है.
खरमास में क्या करें
इस माह में दान-पुण्य, पूजा और धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व बताया गया है. रामायण, गीता और सत्यनारायण कथा का पाठ करना शुभ माना जाता है. सूर्य देव की उपासना, भगवान शिव और विष्णु की पूजा से घर-परिवार में सुख-शांति और सकारात्मक वातावरण बना रहता है.
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