पटना। बिहार की राजनीति के दिग्गज और राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के लिए कानूनी मोर्चे पर परेशानियां फिर से बढ़ती दिख रही हैं। एक तरफ जहां ‘लैंड फॉर जॉब’ मामले में दिल्ली की अदालत ने आरोप तय कर दिए हैं, वहीं दूसरी तरफ ‘चारा घोटाले’ में उनकी रिहाई को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट सख्त रुख अपना रहा है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को साफ कर दिया कि वह 22 अप्रैल को उन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई करेगी, जो उनकी सजा को निलंबित करने के झारखंड हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की गई हैं।
CBI का कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट में जांच एजेंसी CBI की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलील दी कि झारखंड हाईकोर्ट ने सजा निलंबन के तय कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी की है। CBI का आरोप है कि इस घोटाले के आरोपियों को जेल से बाहर रहने का हक नहीं था और वर्तमान में लालू यादव सहित अन्य दोषी तकनीकी खामियों के चलते ‘अवैध’ रूप से बाहर हैं।
कोर्ट की मानवीय टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कानून के साथ-साथ मानवीय पहलुओं पर भी गौर किया। अदालत ने टिप्पणी की कि इस मामले से जुड़े अधिकांश दोषी अब 60 से 80 वर्ष की आयु के बीच हैं। कोर्ट ने कहा कि वह कानून के प्रश्नों से वाकिफ है, लेकिन दोषियों की उम्र और सजा के निलंबन की स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही, जिन आरोपियों का निधन हो चुका है, उनके खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी जाएगी।
क्या है 950 करोड़ का यह चारा घोटाला?
यह पूरा मामला 1992 से 1995 के बीच अविभाजित बिहार के सरकारी खजाने से पशुपालन विभाग के नाम पर हुई 950 करोड़ रुपये की अवैध निकासी से जुड़ा है। उस समय लालू प्रसाद यादव सूबे के मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री थे। रांची की विशेष सीबीआई अदालत ने उन्हें इस मामले में दोषी पाया था, जिसके बाद झारखंड हाईकोर्ट ने उनकी सजा निलंबित की थी। अब सीबीआई इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रही है।
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