वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। प्रदेश में गांव-गांव तक इंटरनेट पहुंचाने वाली भारतनेट परियोजना को लेकर बड़ा कानूनी विवाद सामने आया है। इस मामले में टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड की ओर से दायर याचिका पर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। कंपनी ने अदालत से मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के गठन के लिए दूसरे पंच की नियुक्ति की मांग की है। यह मामला करीब 3056 करोड़ रुपये की भारतनेट फेज-2 परियोजना से जुड़ा है, जिसके तहत राज्य के लगभग 6 हजार ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर के जरिए हाई-स्पीड इंटरनेट से जोड़ना था।

साल 2018 में छत्तीसगढ़ इन्फोटेक प्रमोशन सोसायटी (चिप्स) और टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत टाटा कंपनी को फाइबर केबल बिछाने, नेटवर्क तैयार करने और लंबे समय तक उसके संचालन व रखरखाव की जिम्मेदारी दी गई थी। टाटा प्रोजेक्ट्स का कहना है कि परियोजना को तय समय में पूरा करने में कई बाधाएं आईं, जो उसके नियंत्रण से बाहर थीं।

कंपनी के अनुसार, कई जगह खुदाई की अनुमति समय पर नहीं मिली और किए गए काम का भुगतान समय पर नहीं हुआ। एकतरफा तरीके से जुर्माना लगाया गया। बैंक गारंटी भुना ली गई। ऑपरेशन और मेंटेनेंस का काम शुरू नहीं कराया गया, इन सब कारणों से परियोजना में भारी देरी हुई और कंपनी को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा।

कंपनी का कहना है कि लगातार विवाद और सहयोग न मिलने के कारण उसने मई 2025 में अनुबंध समाप्त कर दिया। इसके बाद विवाद सुलझाने के लिए कंपनी ने मध्यस्थता प्रक्रिया शुरू की और एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश को पंच नियुक्त किया। लेकिन राज्य की ओर से दूसरा पंच नियुक्त नहीं किया गया। इसी वजह से टाटा प्रोजेक्ट्स ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

छत्तीसगढ़ सरकार और चिप्स ने टाटा की याचिका का विरोध किया। सरकार की ओर से कहा गया कि यह परियोजना वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट की श्रेणी में आती है। ऐसे मामलों में विवाद का निपटारा छत्तीसगढ़ मध्यस्थम् अधिकरण अधिनियम, 1983 के तहत ही होगा। सामान्य मध्यस्थता कानून (1996) यहां लागू नहीं होता। सरकार ने यह भी कहा कि टाटा प्रोजेक्ट्स अकेले याचिका नहीं दायर कर सकती, क्योंकि यह काम एक कंसोर्टियम के जरिए किया जा रहा था और अन्य साझेदारों की अनुमति नहीं ली गई।

मामले में केंद्र सरकार की भी भूमिका सामने आई है। भारतनेट परियोजना केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना है और इसका अधिकांश फंड केंद्र से आता है। टाटा प्रोजेक्ट्स का कहना है कि केंद्र सरकार परियोजना की निगरानी में लगातार शामिल रही, इसलिए वह भी विवाद का हिस्सा है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने दोनों पक्षों की लंबी दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।