डॉ. वैभव बेमेतरिहा, रायपुर। राजनांदगांव…. छत्तीसगढ़ को महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश से जोड़ने वाला क्षेत्र. एक ऐसा क्षेत्र जो सघन वनों से परिपूर्ण है. एक ऐसा क्षेत्र जो उच्च श्रेणीयुक्त चुना पत्थर और बॉकसाइट से भरा हुआ है. एक ऐसा क्षेत्र जहाँ से छत्तीसगढ़ की दूसरी सबसे बड़ी नदी शिवनाथ बहती है. एक ऐसा क्षेत्र जो एक नहीं कई रियासतों की कहानी कहती है. एक ऐसा क्षेत्र जो धार्मिक, पुरातात्विक और ऐतिहासिक है. एक ऐसा क्षेत्र जो रंग-कर्म, गीत-संगीत और साहित्यिक है. एक ऐसा क्षेत्र जहाँ पहाड़ी पर विराजित शक्तिपीठ माँ बम्लेश्वरी का मंदिर, तो तराई पर खजुराहो जैसा भोरमदेव का शिवालय है. एक ऐसा क्षेत्र जहाँ एशिया का पहला एकमात्र संगीत विश्वविद्यालय है. एक ऐसा क्षेत्र जिसके कुछ हिस्से में नक्सलवाद का प्रभाव है, जहाँ आदिवासियों के बीच कुछ दर्द, जख्म और घाव है. एक ऐसा क्षेत्र जहाँ की राजनीति में राजपरिवारों का वर्चस्व रहा है. एक ऐसा क्षेत्र जो कभी कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ रहा है. लेकिन अब इस क्षेत्र में दशकों से कमल खिल रहा है. छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी की जमीनी कहानी पढ़िए इस रिपोर्ट में….

लोकसभा चुनाव के लिए 24 अप्रैल शाम 5 बजे दूसरे चरण का चुनावी शोर थम गया. रैलियां, सभा, शोरगुल, हो-हल्ला अब कुछ भी नहीं होगा. क्योंकि 26 अप्रैल को मतदान है. लेकिन मतदान से पहले की क्या है जमीनी रिपोर्ट ? जनता किसे कर रही है सपोर्ट ? कौन पास, कौन फेल ? जीतेंगे संतोष पाण्डेय या भूपेश बघेल ? इसी समीकरण को समझने की एक कोशिश करेंगे इस रिपोर्ट में.

राजनांदगांव… उत्तर से दक्षिण और पश्चिम की ओर फैला एक वृहद लोकसभा क्षेत्र है. लोकसभा का विस्तार राजनांदगांव, कवर्धा, खैरागढ़ और मोहला-मानपुर जिले तक है. लोकसभा में कुल 8 विधानसभा सीटें शामिल हैं. 8 में से 2 विधानसभा सीट एससी और एसटी के लिए आरक्षित हैं. 8 में 5 सीटों पर कांग्रेस के विधायक हैं, जबकि 3 सीटों पर भाजपा काबिज है.

राजनांदगांव पिछड़ा वर्ग बाहुल्य क्षेत्र है. जहां सर्वाधिक आबादी साहू समाज की है. साहू समाज का विस्तार लोकसभा के पूरे क्षेत्र में है. इसके साथ ही कुर्मी, लोधी, यादव, निषाद और सतनामी समाज की बहुलता क्षेत्रवार है. वहीं आदिवासी समाज का फैलाव भी मोहला-मानपुर से लेकर साल्हेवारा, गंडई, रेंगाखार, बोड़ला और पंडरिया के क्षेत्र तक है. अन्य में ब्राम्हण, ठाकुर, अग्रवाल, मारवाड़ी, जैन समाज के लोग प्रभावशील हैं.

राजनांदगांव की राजनीति में राजपरिवारों का वर्चस्व रहा है. दरअसल लोकसभा क्षेत्र में राजनांदगांव, खैरागढ़, कवर्धा के साथ गंडई-लोहारा की रियासतें शामिल हैं. लेकिन राजनीति में प्रभावशील खैरागढ़ राजपरिवार रहा है. 1 उपचुनाव को मिलाकर 17 लोकसभा चुनावों में 7 बार खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्यों ने प्रतिनिधित्व किया है.

चुनावी इतिहास

राजनांदगांव लोकसभा का पहला चुनाव सन् 1957 में हुआ था. 1957 के पहले चुनाव से लेकर 1967 तक लगातार तीन चुनावों में खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्यों ने कांग्रेस की टिकट पर जीत हासिल की थी. 1957 और 62 में लगातार दो बार बीरेंद्र बहादुर सिंह जीते थे. 1967 में पद्मावती देवी जीतीं थी. 1971 राजपरिवार की जगह कांग्रेस ने रामसहाय पाण्डेय को टिकट दी और वो भी जीते थे. हालांकि 75 के आपातकाल के बाद 77 में हुए चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था. 77 में भारतीय लोकदल के मदन तिवारी जीते थे.

राजपरिवार

1980 के चुनाव में कांग्रेस ने शानदार वापसी की और 80 से 89 तक एक बार फिर खैरागढ़ राजपरिवार का वर्चस्व रहा. राजपरिवार के शिवेन्द्र बहादुर सिंह लगातर दो चुनाव जीते. लेकिन 89 में इस सीट पर भाजपा का खाता खुला और धर्मपाल सिंह गुप्ता कांग्रेस को हराने में सफल रहे. 91 के चुनाव में कांग्रेस ने फिर वापसी की ओर राजपरिवार के शिवेन्द्र बहादुर सिंह तीसरी बार सांसद बने. हालांकि 96 के चुनाव में भाजपा ने फिर बाजी मारी और अशोक शर्मा जीतकर संसद पहुंचे. 98 के चुनाव में कांग्रेस फिर से इस सीट को जीतने में कामयाब रही थी. पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा दुर्ग से जाकर राजनांदगांव से चुनाव लड़े थे और जीत गए थे.

भाजपा का गढ़

इस तरह से 89 से लेकर 98 तक पूरे एक दशक तक कांग्रेस और भाजपा के बीच जीत-हार का खेल चलता रहा है. हालांकि 57 से लेकर 89 तक के चुनावों में कांग्रेस का ही दबदबा रहा और राजनांदगांव सीट की चर्चा तब कांग्रेस के मजबूत गढ़ के रूप में होती रही. लेकिन 1999 में मोतीलाल वोरा की हार और डॉ. रमन सिंह की जीत के साथ ही यह सीट भाजपा के गढ़ में बदल गई. 99 से भाजपा का जो कमल खिला वो 2019 तक बीते दो दशक से लगातर खिल रहा है. लोकसभा के चुनाव में पंजे की पकड़ इस सीट पर लगातार कमजोर होती चली गई.

2004 में भाजपा की टिकट पर प्रदीप गांधी जीते. हालांकि 2007 में हुए उपचुनाव में एक बार फिर खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्य ने कांग्रेस की वापसी कराई और देवव्रत सिंह जीतने में सफल रहे थे. लेकिन 2009 में भाजपा ने फिर शानदार वापसी की. 09 में मधुसूदन यादव, 14 में डॉ. रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह और 19 में संतोष पाण्डेय भाजपा का कमल खिलाने में सफल रहे.

दिलचस्प बात

2024 के चुनाव में मुकाबला दिलचस्प है. क्योंकि मुकाबला मौजूदा सांसद संतोष पाण्डेय और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच है. इसे संयोग ही कहिए कि भूपेश बघेल भी मोतीलाल वोरा की तरह ही दुर्ग से जाकर राजनांदगांव सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री रहते तब वोरा पहली बार इस सीट से चुनाव जीतने में सफल रहे थे, लेकिन दूसरे ही चुनाव में हार गए थे. वहीं संतोष पाण्डेय के साथ दिलचस्प यह है कि 99 के बाद भाजपा ने किसी सांसद को इस पर सीट पर रिपीट नहीं किया था. डॉ. रमन सिंह से लेकर उनके बेटे अभिषेक सिंह तक किसी को दूसरी बार टिकट नहीं मिली. लेकिन संतोष पाण्डेय दूसरी बार टिकट पाने में सफल रहे हैं.

संतोष पाण्डेय, भाजपा प्रत्याशी

संघ पृष्ठभूमि से आने वाले संतोष पाण्डेय बेदाग छवि के हिंदूवादी नेता हैं. संघ की पहली पसंद और केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा उन पर है. भाजपा के सभी गुटों में वे सर्वमान्य माने जाते हैं. संगठन के नेताओं के साथ बेहतर तालमेल बनाकर रखते हैं. बीते 3 दशक से सक्रिय राजनीति में हैं. सांसद बनने के बाद संसद में भी बड़े मुखर और प्रखर रहे राज्य एक कई मुद्दे को उन्होंने प्रमुखता से उठाया, जिसकी चर्चा दिल्ली और छतीसगढ़ में होती रही. हिंदुत्व के मुद्दे और मोदी मैजिक के सहारे एक बार फिर जीत की उम्मीद में हैं.

संतोष पाण्डेय को जीताने में संघ और भाजपा संगठन दोनों ने ताकत झोंक दी है. केंद्रीय गृह अमित शाह से लेकर यूपी के मुख्ममंत्री योगी आदित्यनाथ और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव तक की सभा हुई है. इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी सभाएं की और रोड शो भी किया है. स्थानीय स्तर पर उपमुख्यमंत्री अरुण साव और विजय शर्मा के साथ मंत्रियों ने भी प्रचार किया है.

संतोष पाण्डेय ने बड़े नेताओं के साथ चुनावी रैलियों में हिस्सा तो लिया ही गांव-गांव में सघन प्रचार भी किया है. ठेठ छत्तीसगढ़ी भाषण और गीतों के साथ राष्ट्रवाद, धर्म, धर्मांतरण के विषयों को मतदाताओं तक पहुँचाया ही है, मोदी सरकार में लिए गए 370, तीन तलाक, राम मंदिर जैसे फैसलों को भी गिनाया है. एक तरह संतोष पाण्डेय चुनावी युद्ध में राष्ट्रवाद और मोदी मैजिक के सहारे नैय्या पार कराने में लगे हैं.

भूपेश बघेल, कांग्रेस प्रत्याशी

भूपेश बघेल 6 बार के विधायक और राजनीति में 4 दशक से सक्रिय हैं. अविभाजित मध्यप्रदेश में भी मंत्री रहे हैं. छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं. 2018 से 2023 तक मुख्यमंत्री रहे. यही नहीं अपने कार्यकाल के दौरान सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री रहे. ओबीसी वर्ग में भी सबसे मजबूत नेताओं में से एक हैं. किसान नेता के रूप में भी उनकी छवि राष्ट्रीय स्तर है. इसके साथ ही राजनांदगांव को विभाजित कर मोहला-मानपुर और खैरागढ़ दो नए जिले बनाने का श्रेय भी उनके हिस्से है. हाालंकि इन सबके बीच कई तरह के विवादों और आरोपों से भी घिरे हैं. महादेव सट्टा एप में एफआईआर. कोयला, शराब में घोटाले का आरोप और तो और पार्टी के अंदर गुटबाजी और कार्यकर्ताओं का खुलेआम बगावत भी झेल रहे हैं.

इन सबके बीच भूपेश बघेल राजनांदगांव सीट पर प्रत्याशी भी हैं और स्टार प्रचारक भी है. क्योंकि भाजपा की तरह ही उनके लिए कांग्रेस के बड़े राष्ट्रीय प्रचारकों ने प्रचार नहीं किया है. राष्ट्रीय स्तर पर प्रियंका गांधी की एक सभा हुई है. भूपेश बघेल ने अकेले ही मानपुर से लेकर पंडरिया तक खुद मोर्चा संभाल रखा है. बीते एक महीने से बिना गेप के बघेल ने सघन प्रचार किया है. बघेल ने बड़ी रैलियों की जगह गांव-गांव नुक्कड़ सभाओं में जोर दिया है. सुबह 10 बजे से लेकर रात 11 बजे तक लगातार उनकी चुनावी यात्राएं चलती रही है.

भूपेश बघेल ने अपने ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज को चुनावी हथियार बना रखा है. मोदी सरकार की नाकामी गिनाने के साथ ही वे अपने कार्यकाल की उपलब्धियां याद दिलाते हैं. साय सरकार की खिंचाई पर सांय-सांय अंदाज में करके लोगों को रिझाते हैं. हंसी-ठिठोली के बीच गंभीरता के साथ संविधान खतरे में जैसे मुद्दे को भी जोर-शोर उठाते हैं. कहते हैं कि मोदी सरकार फिर से आई तो संविधान बदल जाएगा और फिर देश में लोकतंत्र नहीं रहेगा. इन मुद्दों के बीच वे धान और किसान की भी बात करते हैं. आदिवासी और ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर भी जोर देते हैं और भाजपा सरकार पर इसे लटकाने का आरोप लगाते हैं.

क्षेत्रवार प्रभाव

प्रत्याशियों के दावों और प्रचार से इतर जनता का मूड क्षेत्रवार अलग-अलग दिखाई पड़ता है. मोहला-मानपुर कुछ हद तक मोदी सरकार के एजेंडे में शामिल राष्ट्रीय मुद्दें का असर दिखता है, तो उससे कहीं ज्यादा स्थानीय मुद्दों का प्रभाव. स्थानीय स्तर जल-जंगल-जमीन की लड़ाई है, विकास और विस्थापन है, शिक्षा और स्वास्थ्य, पानी और सड़क है, बेरोजगारी और नक्सलवाद है.

इसी तरह से खुज्जी, डोंगरगांव और डोंगरगढ़ में धान और किसान का मुद्दा भी प्रभावशील है. लेकिन पेयजल की सबसे बड़ी समस्या के बीच राष्ट्रवाद और मोदी मैजिक का भी असर दिखता है. राजनांदगांव, खैरागढ़, कवर्धा और पंडरिया जैसे क्षेत्र में हिंदुत्व, धर्म, धर्मांतरण के साथ ही मोदी सरकार में लिए गए धारा 370, तीन तलाक और राम मंदिर निर्माण प्रभावकारी ढंग दिखाई पड़ते हैं. लेकिन इन सबके बीच कांग्रेस ने बतौर सांसद संतोष पाण्डेय की सक्रियता नहीं होने के मुद्दे पर भी हमलावार है और गाँव- गाँव कांग्रेस संतोष पाण्डेय के पास कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होने का मुद्दा उठा रही है. दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में भूपेश बघेल को काका के रूप में याद करते हुए भी मिल जाते हैं.

जात-पात नहीं

जातिगत समीकरणों की बात की जाए तो चुनावी इतिहास यह बताने के लिए काफी यह है कि लोकसभा के चुनाव में जातिगत समीकरण असरहीन ही रहा है. हालांकि मौजूदा चुनाव को कांग्रेस ओबीसी और सवर्ण के मुकाबले के रूप में कुछ हद बताने में सफल रही है. बावजूद इसके मुकाबला राष्ट्रीय मुद्दों और नेतृत्तवकर्ता चेहरों पर दिख रहा है.

मुद्दे- पलायन, बेरोजगारी, नक्सल, धर्म, हिंदुत्व, धान, किसान के साथ पेयजल का मुद्दा सबसे बड़ा है. गर्मीं के दिनों में कई क्षेत्रों में भीषण जल संकट रहता है. इसे दूर कर पाने में भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारें नकाम रही है.

कुल मतदाता- 18 लाख 65 हजार 1975
महिला मतदाता- 9 लाख 36 हजार 837
पुरूष मतदाता- 9 लाख 23 हजार 29
(महिला और युवा मतदाताओं की संख्या अधिक है. करीब 3 लाख नए मतदाता जुड़े हैं.)

पिछला परिणाम

भाजपा प्रत्याशी संतोष पाण्डेय को 6 लाख 62 हजार 387 को मत प्राप्त हुए थे, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी भोलाराम साहू को 5 लाख 50 हजार 421 मत. संतोष पाण्डेय करीब 1 लाख 11 मतों से विजयी हुए थे.