LPG Alternative Go-Kashtha: राजधानी में रसोई गैस (LPG) की किल्लत से जूझ रहे लोगों ने अब कमर कस ली है। संकट के इस दौर में जयपुर वासी आधुनिकता को पीछे छोड़कर फिर से अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। रसोई में गैस की जगह अब गोबर से बने गो-काष्ठ (काउ डंग लॉग्स) ने ले ली है, जो न केवल सस्ता है बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहतर है।

श्री अमरापुर आश्रम में रोजाना 7 हजार लोगों का भोजन
शहर के प्रसिद्ध श्री अमरापुर आश्रम में हर दिन लगभग 7,000 जरूरतमंदों को भोजन परोसा जाता है। इतनी बड़ी मात्रा में भोजन बनाने के लिए भारी मात्रा में गैस की खपत होती है। आश्रम के संत मोहनलाल के अनुसार, गैस की किल्लत को देखते हुए उन्होंने अब गो-काष्ठ को अपना विकल्प बनाया है।
गैस सप्लाई प्रभावित होने पर अब बड़े चूल्हों पर गो-काष्ठ का इस्तेमाल कर भोजन पकाया जाएगा। आश्रम की दो गौशालाओं में गोबर से गो-काष्ठ तैयार किए जा रहे हैं, जिससे आत्मनिर्भरता बढ़ी है।
केवल संकट नहीं, बचत का भी जरिया
आदर्शनगर क्षेत्र के समाजसेवी और भाजपा नेता रवि नैय्यर भी इस स्वदेशी पहल को बढ़ावा दे रहे हैं। उनका मानना है कि यह सिर्फ गैस संकट का समाधान नहीं, बल्कि एक स्थायी जीवनशैली है। एक औसत परिवार का गैस सिलेंडर का मासिक खर्च 1000 रुपये तक होता है, जबकि गो-काष्ठ के उपयोग से यह घटकर 500 रुपये के आसपास रह जाता है। गो-काष्ठ के उपयोग से कम धुआं निकलता है और यह कचरा प्रबंधन (Waste Management) का भी एक बेहतरीन तरीका है।
वापस लौट रही पुरानी परंपरा
एक समय था जब ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर के उपले ईंधन का मुख्य साधन थे। समय के साथ हम एलपीजी पर निर्भर हो गए, लेकिन मौजूदा गैस संकट ने लोगों को दोबारा पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की महत्ता समझाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि गो-काष्ठ का जलना पूरी तरह से प्राकृतिक है और यह गोवंश आधारित अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है।
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