Maa Bhadrakali Temple Abu Road: राजस्थान के आबूरोड में स्थित प्राचीन मां भद्रकाली मंदिर आस्था, शक्ति उपासना और सनातन परंपरा का विशिष्ट केंद्र है। मंदिर में विराजमान मां भद्रकाली की प्रतिमा करीब 700 वर्ष पुरानी बताई जाती है। मान्यता है कि माता का प्राकट्य भगवान शिव की जटा से हुआ था। वत्स गोत्र की पांच शाखाएं मां भद्रकाली को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजती हैं। नवरात्रि और दीपावली पर यहां तीन दिवसीय विशेष अनुष्ठान भी होते हैं।

वत्स गोत्र की पांच शाखाओं की कुलदेवी हैं मां भद्रकाली

मंदिर की प्रमुख विशेषता वत्स गोत्र की पांच शाखाओं से जुड़ी कुलदेवी की परंपरा है। इनमें वत्स, चौहान, अपनावां, अरवा और जमदग्नि शाखाएं शामिल हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा परिवारों को अपनी जड़ों और पूर्वजों की मान्यताओं से जोड़ती है। मंदिर में मां भद्रकाली के साथ मणिभद्र वीर, गणेशजी और वीरेश्वर महादेव की भी पूजा की जाती है। यहां विभिन्न हिंदू समाजों के श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और माता के समक्ष भेंट अर्पित करते हैं।

नवरात्रि और दीपावली पर तीन दिन तक विशेष पूजा

मां भद्रकाली मंदिर में नवरात्रि और दीपावली का विशेष धार्मिक महत्व है। इन दोनों अवसरों पर तीन दिवसीय पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं। ब्राह्मण समाज के लोग पूजा-पद्धति और धार्मिक परंपराओं का निर्वहन करते हैं। राजपूत, ब्राह्मण, सोनार सहित विभिन्न समाजों के श्रद्धालु माता के दर्शन कर परिवार की खुशहाली, व्यापार में उन्नति, सुख-समृद्धि और जीवन में शांति की कामना करते हैं। इन आयोजनों में सामूहिक आस्था के साथ पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की झलक भी दिखाई देती है।

अमरावती नगरी और सिरोही राजपरिवार से जुड़ी मान्यता

मंदिर की धार्मिक परंपराओं का संबंध प्राचीन अमरावती नगरी के द्वार और सिरोही राजपरिवार की आस्था से भी जोड़ा जाता है। मंदिर से जुड़ी मान्यताएं इसे क्षेत्र के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में स्थान देती हैं। करीब 700 वर्ष पुरानी प्रतिमा और विशेष पर्वों पर होने वाले अनुष्ठान मंदिर की पहचान का अहम हिस्सा हैं। यहां की परंपराएं धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक विरासत को भी आगे बढ़ाती हैं।

अर्गला स्तोत्र से होती है मां भगवती के स्वरूपों की स्तुति

विभूति नवीन चंद्र उपाध्याय महाराज के अनुसार, मां भद्रकाली के प्राकट्य को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है। माता की स्तुति में दुर्गा सप्तशती के अर्गला स्तोत्र का विशेष महत्व माना जाता है।

इस स्तुति में कहा गया है…

‘जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी,
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।’

इस मंत्र के माध्यम से मां भगवती के विभिन्न स्वरूपों की आराधना की जाती है।

धार्मिक परंपराओं के साथ सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण

मां भद्रकाली मंदिर की पहचान उसकी प्राचीन प्रतिमा, कुलदेवी के रूप में पूजा और विशेष पर्वों पर होने वाले अनुष्ठानों से जुड़ी है। पीढ़ियों से चली आ रही ये परंपराएं नई पीढ़ी को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराती हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि परिवार की मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े रहने का माध्यम भी है।

पढ़ें ये खबरें