सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) को लेकर अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी सरकारी कर्मचारी को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करना न तो दंडात्मक कार्रवाई है और न ही इससे उसकी प्रतिष्ठा पर कोई दाग लगता है। इसका यह अर्थ भी नहीं है कि कर्मचारी को कदाचार का दोषी ठहराया गया है। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ ने शुक्रवार को यह टिप्पणी करते हुए छत्तीसगढ़ सरकार के पांच कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने के फैसले को बरकरार रखा।
जनहित में अनिवार्य सेवानिवृत्ति का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी किसी कर्मचारी के समग्र सेवा रिकॉर्ड का आकलन करने के बाद यह तय कर सकता है कि उसे सेवा में बनाए रखना जनहित में है या नहीं। यदि किसी अधिकारी की उपयोगिता समाप्त हो गई है या उसे पद पर बनाए रखने से प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होने की आशंका है, तो सरकार अनिवार्य सेवानिवृत्ति का फैसला ले सकती है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा निर्णय मनमानी या अटकलों पर आधारित नहीं होना चाहिए। इसके लिए सेवा रिकॉर्ड में ठोस और प्रासंगिक सामग्री उपलब्ध होना जरूरी है।
छत्तीसगढ़ सरकार के आदेश को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी
शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 12 अप्रैल 2023 के फैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के 2017 के उस परिपत्र को सही ठहराया था, जिसके तहत पांच कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी।
अदालत ने कहा कि कर्मचारी केवल इस आधार पर आदेश को चुनौती नहीं दे सकता कि समान सेवा रिकॉर्ड वाले किसी दूसरे अधिकारी के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं हुई। प्रत्येक कर्मचारी की ईमानदारी, कार्यक्षमता और उपयोगिता का मूल्यांकन अलग-अलग किया जाता है।
14 कर्मचारियों के रिकॉर्ड की हुई थी समीक्षा
पीठ के मुताबिक, जांच समिति ने 14 कर्मचारियों के सेवा रिकॉर्ड की समीक्षा की थी। इनमें से पांच कर्मचारियों का समग्र प्रदर्शन निर्धारित मानकों से नीचे पाया गया। उनकी हालिया गोपनीय रिपोर्ट (ACR) में असंतोषजनक प्रदर्शन और घटती कार्यक्षमता के संकेत मिले थे। वहीं, शेष नौ कर्मचारियों को निर्धारित मानकों पर खरा उतरने के कारण सेवा में बनाए रखने योग्य पाया गया। इस फैसले से स्पष्ट है कि जनहित और प्रशासनिक दक्षता के आधार पर सरकार ठोस रिकॉर्ड के सहारे अनिवार्य सेवानिवृत्ति का निर्णय ले सकती है।
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