Chhattisgarh Sterilisation Deaths : वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर. बहुचर्चित नसबंदी कांड मामले में 12 साल बाद कोर्ट ने बड़ा फैसला आया है. न्यायालय प्रथम सत्र न्यायाधीश शैलेश केतारप की कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए डॉक्टर आर के गुप्ता को मामले में दोषी ठहराया है. डॉ.गुप्ता के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का आरोप जांच में सिद्ध हुआ है. वहींं इस मामले में अन्य पांच आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया गया है.


बता दें कि साल 2014 में सकरी नेमीचन्द जैन अस्पताल में नसबंदी का शिविर लगा था. इसमें कुल 85 महिलाओं और पुरुषों की नसबंदी हुई थी, जिसके बाद 18 लोगों की मौत हो गई थी. मृतकों में 13 महिलाएं और 5 पुरुष शामिल थे. मामले की जांच में ऑपरेशन के दौरान लापरवाही बताया गया था. यह घटना न केवल प्रदेश बल्कि देशभर में सुर्खियों में रहा. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बिलासपुर का दौरा कर मृतकों के परिजनों से मुलाकात की थी. मामले की अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता देवेंद्र राव सोमावार ने पुष्टि की. महिलाओं की मौत को लेकर विपक्ष के साथ की समाजसेवी संस्थाओं ने सवाल उठाए थे. तत्कालीन डॉ. रमन सिंह की सरकार ने मामले की जांच कर कार्रवाई के आदेश दिए थे.
नसबंदी शिविर में ड्यूटी करने वाले सभी डॉक्टरों और स्टाफ का बयान दर्ज किया गया था. मामले में तत्कालीन सीएमएचओ सहित कुछ डॉक्टर और मेडिसिन विभाग के अलावा कुछ स्टाफ के लोगों पर निलंबन की कार्रवाई की गई थी. राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहलाने वाले संरक्षित जाति के डॉक्टर धर्मवीर सिंह ध्रुव और राजेश छत्रिय को सस्पेंड किया गया था. वहीं डॉ. धर्मवीर सिंह ध्रुव ने राष्ट्रपति को खुद के निलंबन की शिकायत करते हुए बेवजह फंसाने की बात कही थी.
सिप्रोसीन दवा के सेवन के बाद हुई थी मौत
नसबंदी कांड की जांच करने वाली समिति ने पाया था कि महिलाओं को सिप्रसीन दवा सेवन के लिए दी गई थी. इसी दवा के कारण 13 माहिलओं ने दम तोड़ा. वहीं झोलाछाप डॉक्टरों से बीमारी का इलाज कराने वाले आधा दर्जन मरीजों की भी सिप्रोसीन दवा खाने के बाद मौत हो गई थी. मामले में सिप्रोसीन दवा बनाने वाली कंपनी महावर फार्मा के संचालक रमेश महावर, दवा को बेचने वाला दुकानदार, कविता लैबोरेटरी के संचालक राकेश खरे और राजेश के खिलाफ कार्रवाई की गई थी.
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