शब्बीर अहमद, भोपाल। मध्य प्रदेश के साढ़ें चार लाख से अधिक पेंशनर्स के लिए एक निराशाजनक खबर सामने आई है। वर्षों से छठवें और सातवें वेतनमान के बकाया एरियर का इंतजार कर रहे बुजुर्ग पेंशनरों को तगड़ा झटका देते हुए राज्य सरकार अब एरियर भुगतान के बजाय कोर्ट से स्टे लेने की राह पर चल पड़ी है। वित्त विभाग ने प्रदेश के सभी विभागों, संभागीय आयुक्तों और जिला कलेक्टरों को पत्र जारी कर निर्देश दिए हैं कि पेंशन पुनरीक्षण एरियर से जुड़े मामलों में कोर्ट से तत्काल स्थगन हासिल किया जाए।
32 और 27 महीने के एरियर्स का पेच
मामला कुल 59 महीने के बकाया एरियर भुगतान से जुड़ा हुआ है, जिसे दो अलग-अलग समयावधियों में बांटा गया है:
छठवां वेतनमान (32 महीने का एरियर): 1 जनवरी 2006 से 31 अगस्त 2008 तक की अवधि का 32 महीने का एरियर अब तक करीब 2 लाख 46 हजार पेंशनरों को नहीं दिया गया है। इसे चुकाने के लिए सरकार पर करीब 400 करोड़ रुपए का वित्तीय बोझ आ रहा है।
सातवां वेतनमान (27 महीने का एरियर): 1 जनवरी 2016 से 31 मार्च 2018 तक की अवधि का 27 महीने का एरियर लंबित है। इसके दायरे में प्रदेश के लगभग 4.50 लाख पेंशनर आ रहे हैं, जिसका कुल बकाया आंकड़ा करीब 4000 करोड़ रुपए तक पहुंच रहा है।
कुल मिलाकर सरकार को करीब 4400 करोड़ रुपए का भुगतान करना है, जिसे टालने के लिए अब विधिक रास्ते तलाशे जा रहे हैं।
HC इंदौर खंडपीठ के आदेशों का हवाला, अवमानना याचिकाओं में भी लेंगे स्टे
सोमवार को जारी वित्त विभाग के आदेश के अनुसार राज्य शासन ने स्पष्ट किया है कि हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ द्वारा दिए गए आदेशों को आधार बनाते हुए पेंशन पुनरीक्षण एरियर से संबंधित सभी लंबित प्रकरणों और अवमानना याचिकाओं में स्थगन लिया जाए। शासन का तर्क है कि भारी भरकम वित्तीय भार के कारण एकमुश्त या तुरंत यह भुगतान संभव नहीं हो पा रहा है, इसलिए प्रशासनिक स्तर पर कानूनी रक्षात्मक रुख अपनाया जा रहा है।
कलेक्टरों और संभागीय आयुक्तों को सख्त निर्देश
राज्य शासन ने स्पष्ट किया है कि जिन भी जिलों या विभागों में पेंशनरों द्वारा कोर्ट केस दायर किए गए हैं, वहां के जिला कलेक्टर और विभागाध्यक्ष हाईकोर्ट के आदेशों को प्रस्तुत कर मामलों में आगे की भुगतान कार्रवाई रोकने हेतु स्थगन आवेदन प्रस्तुत करें।

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