संजय पाटीदार, भोपाल। MP Chatra Sangh Chunav: नौ साल से कैंपस में छात्र राजनीति का इंतजार… इस बार उम्मीद जगी कि शायद ये इंतजार खत्म होगा लेकिन सितंबर भी खत्म होने की कगार पर है और चुनाव की तस्वीर अब तक साफ नहीं है। सरकार ने हाईकोर्ट में सितंबर में छात्रसंघ चुनाव कराने की बात कही थी लेकिन अब तक छात्र संघ चुनाव को लेकर कोई कार्यक्रम सामने नहीं आया है। 

अब  सवाल है कि क्या कॉलेजों में नई पीढ़ी को अपना छात्र प्रतिनिधि चुनने का मौका मिलेगा। सितंबर खत्म होने को है, ऐसे में सवाल सिर्फ चुनाव की तारीख का नहीं बल्कि ये है कि अगर अब भी प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो क्या छात्रसंघ चुनाव फिर लंबा इंतजार बन जाएंगे। आगे आने वाले महीनों में  त्योहार शुरू हो जाएंगे इस बीच क्या एमपी में छात्रसंघ चुनाव हो पाएंगे।

आजादी से ठीक पहले और उसके आसपास विश्वविद्यालयों में छात्रों के प्रतिनिधि संगठन बनने लगे। दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र प्रतिनिधि संगठन बनाने का प्रस्ताव 6 अगस्त 1947 को सामने आया। इसके बाद DUSU का गठन हुआ और पहला आधिकारिक चुनाव 1954 में हुआ। शुरुआत में चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से होते थे। इसके बाद छात्रसंघ चुनाव देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में फैलते गए। 

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अपने रिकॉर्ड के मुताबिक संगठन ने 1970 में सबसे पहले उत्तर प्रदेश में छात्रसंघ या स्टूडेंट काउंसिल चुनावों में भाग लेना शुरू किया जिसके बाद दूसरे राज्यों में भी चुनावी भागीदारी बढ़ी। NSUI यानी नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया का गठन 9 अप्रैल 1971 को हुआ था। इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर राष्ट्रीय स्तर के छात्र संगठन के रूप में बनाया गया। इसके गठन के लिए केरल स्टूडेंट्स यूनियन और पश्चिम बंगाल की छात्र परिषद  को मिलाकर एक राष्ट्रीय छात्र संगठन बनाया गया जिसे NSUI नाम दिया गया। 

कांग्रेस के अनुसार भी NSUI की स्थापना इसी विलय के बाद 9 अप्रैल 1971 को हुई थी। मध्यप्रदेश में छात्रसंघ चुनाव का इतिहास कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 2017 में आखिरी बार प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव हुए थे। इसके बाद लगातार चुनाव नहीं हो सके और अब 2026 में अगर चुनाव होते हैं तो करीब नौ साल बाद कैंपस में छात्र राजनीति की चुनावी वापसी होगी।

अगस्त में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के सामने सरकार ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के अकादमिक कैलेंडर का हवाला देते हुए सितंबर 2026 में छात्रसंघ चुनाव कराने का प्रावधान बताया था। जिसके बाद छात्रों और छात्र संगठनों में चुनाव को लेकर उम्मीद जगी थी। लेकिन सितंबर का बड़ा हिस्सा बीत चुका है और अभी तक चुनाव कार्यक्रम स्पष्ट नहीं है।

छात्रसंघ चुनाव सिर्फ पद और राजनीति का चुनाव नहीं माना जाता। इसका सीधा संबंध छात्रों की आवाज और उनके प्रतिनिधित्व से भी है। फीस, परीक्षा, रिजल्ट, हॉस्टल, लाइब्रेरी, कैंपस की सुरक्षा और दूसरी छात्र सुविधाओं से जुड़े मुद्दे निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिए प्रशासन तक पहुंचाए जा सकते हैं।

चुनाव छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने और नई नेतृत्व क्षमता विकसित करने का मौका भी देता है। दोनों ही प्रमुख संगठन ABVP और NSUI जल्द ही छात्र संघ चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं। छात्र संघ चुनाव में देरी को कांग्रेस राष्ट्रीय सचिव कुणाल चौधरी ने भाजपा के डर से जोड़ दिया और कहा बीजेपी छात्र संघ चुनाव करना भी चाहती है।

भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों का पलटवार करते हुवे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव परिणाम कांग्रेस को याद दिला दिया और कहा कि देश का zen जी भाजपा के साथ है। 

नौ साल बाद कैंपस में छात्र राजनीति की वापसी की उम्मीद तो जगी लेकिन छात्रसंघ चुनाव अभी भी अधर में है। सितंबर खत्म होने को है लेकिन चुनाव की तस्वीर अब तक साफ नहीं है।

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