प्रदीप मालवीय, उज्जैन। दीपावली की जगमगाहट के बीच उज्जैन में एक ऐसी जगह भी थी, जहां आधी रात के बाद का नजारा कुछ अलग ही था। चारों तरफ श्मशान का सन्नाटा, पास में चिता स्थल, कहीं जलता यज्ञ कुंड तो कहीं मां काली की आराधना में लीन साधक। यह नजारा था उज्जैन के चक्रतीर्थ श्मशान का, जहां काली चौदस की रात अलग-अलग जगहों से अघोरी और साधक तंत्र साधना के लिए पहुंचे। आमतौर पर रात के अंधेरे और श्मशान के नाम से लोग दूर रहते हैं, लेकिन इन साधकों के लिए यही रात और यही जगह बेहद खास है।
क्या है मान्यता?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रूप चौदस यानी नरक चतुर्दशी और दीपावली के बीच की रात को काली चौदस के नाम से भी जाना जाता है। साधक इस रात को कालरात्रि मानते हैं। उनका विश्वास है कि इस रात की गई साधना विशेष फल देती है। इसी मान्यता के चलते चक्रतीर्थ श्मशान में देर रात तक साधकों का जमावड़ा लगा रहा। कोई मां काली का आह्वान कर रहा था तो कोई भैरव और भैरवी की आराधना में जुटा था।
साधक ने कही ये बात
श्मशान में मौजूद एक साधक ने बताया कि उन्होंने इस रात मां काली, भैरव बाबा, सरभंग बाबा और बम बम नाथ का आह्वान किया। साधकों के अनुसार, जो लोग लंबे समय से इस मार्ग पर साधना कर रहे हैं, उनके लिए काली चौदस की रात विशेष महत्व रखती है। इस रात देवी-देवताओं को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद और सिद्धि प्राप्त करने की कामना की जाती है।
अघोरी बोले- दूसरों के दुख कम करने की कामना
चक्रतीर्थ पर मौजूद अघोरी रेणुका नाथ महाराज की साधना का उद्देश्य भी दिलचस्प है। वे करीब 17-18 वर्षों से इस मार्ग से जुड़े हैं। उनका कहना है कि वे अपने लिए कुछ मांगने के बजाय उन लोगों की मदद करना चाहते हैं, जो परेशान हैं, पीड़ा में हैं या न्याय की उम्मीद लेकर उनके पास आते हैं। उनके लिए देवी की साधना का अर्थ दूसरों के दुख कम करने की कामना करना है।
श्मसान में डर नहीं बल्कि शांति और सुकून
श्मशान का नाम सुनते ही आमतौर पर लोगों के मन में भूत-प्रेत और डरावने ख्याल आने लगते हैं, लेकिन यहां मौजूद महिला अघोरी की सोच इससे बिल्कुल अलग है। उन्होंने बताया कि वे मां काली की आराधना और उनका आशीर्वाद लेने के लिए यहां आती हैं। उनके मुताबिक, श्मशान में उन्हें डर नहीं बल्कि शांति और सुकून महसूस होता है। वे बचपन से ही पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड से जुड़ी रही हैं और धीरे-धीरे उनकी रुचि साधना के इस मार्ग में बढ़ती गई।
देर रात तक चलता रहा साधना का सिलसिला
चक्रतीर्थ श्मशान में कुछ पुरुष अघोरी भी साधना के लिए पहुंचे थे, लेकिन उन्होंने मीडिया के सामने आने से इनकार कर दिया। ऐसे में वे कैमरे से दूर रहकर अपनी साधना में लीन रहे। यहां मां काली का मंदिर, पंच भैरव और यज्ञ कुंड के आसपास देर रात तक साधना का सिलसिला चलता रहा। किसी के लिए यह सिद्धि पाने की रात थी तो किसी के लिए मां से आशीर्वाद मांगने का अवसर।
श्मशान में सकारात्मक ऊर्जा भी- साधक
उज्जैन को बाबा महाकाल की नगरी कहा जाता है। शिप्रा नदी के किनारे स्थित चक्रतीर्थ श्मशान को भी साधक अपनी मान्यताओं के अनुसार विशेष महत्व का स्थान मानते हैं। उनका कहना है कि यह जागृत श्मशान है और यहां की ऊर्जा को वे महसूस करते हैं। साधकों के मुताबिक, श्मशान में केवल नकारात्मकता नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा भी होती है। यह सब व्यक्ति की सोच और मानसिकता पर निर्भर करता है।
एक तरफ दीपावली की रोशनी में पूरा उज्जैन जगमगा रहा था, तो दूसरी तरफ चक्रतीर्थ श्मशान में काली चौदस की रात साधना का अलग ही नजारा देखने को मिला। चिता स्थल के करीब मां काली की आराधना, भैरव का आह्वान और आधी रात तक चलने वाले अनुष्ठान। आम लोगों के लिए रहस्य और रोमांच से भरी यह जगह साधकों के लिए आस्था और साधना का केंद्र बनी रही।
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