नंदीग्राम उपचुनाव से पहले कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई। जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की अदालत ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल सरकार के वकील से कहा कि यदि मिलन प्रधान को जमानत मिलती है, तो उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दी जाए। मिलन प्रधान पर कुल 11 मामले दर्ज हैं और इनमें से 5 मामलों में उन्हें गिरफ्तार किया जा चुका है। फिलहाल वह न्यायिक हिरासत में हैं।

2007 के नंदीग्राम मामलों में न्यायिक हिरासत

हल्दिया सब-डिविजनल कोर्ट ने 19 सितंबर को चार मामलों में मिलन प्रधान को 3 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा था। ये मामले 2007 के नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से जुड़े हैं।

इसके बाद 21 सितंबर को कांथी कोर्ट ने करीब दो दशक पुराने आर्म्स एक्ट मामले में उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इन आदेशों के चलते 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम उपचुनाव में उनके प्रचार अभियान पर भी असर पड़ा है। चुनाव प्रचार 4 अक्टूबर को समाप्त होगा और मतगणना 9 अक्टूबर को होगी।

गिरफ्तारी को लेकर हाईकोर्ट में चुनौती

मिलन प्रधान के वकील अयान भट्टाचार्य ने कहा कि वह कांथी कोर्ट के आदेश को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती देंगे। इससे पहले प्रधान ने छह मामलों में पुलिस की संभावित कार्रवाई से सुरक्षा की मांग की थी।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि इनमें से पांच मामले पिछली सरकार के दौरान वापस लिए जा चुके हैं, जबकि एक अन्य मामले में प्रधान वांटेड नहीं हैं। प्रधान के वकील ने स्पष्ट किया कि जिन पांच मामलों में गिरफ्तारी हो चुकी है, उनमें वे फिलहाल राहत नहीं मांग रहे हैं।

सरकार ने गिरफ्तारी को बताया कानूनी कार्रवाई

राज्य के एडिशनल एडवोकेट जनरल ने कहा कि प्रधान की गिरफ्तारी निचली अदालत के लंबित वारंट के आधार पर हुई है। उनके मुताबिक, 2007 के एक आपराधिक मामले में यह वारंट 2021 से लंबित था।

सरकार ने यह भी कहा कि चुनाव से पहले लंबित गिरफ्तारी वारंट पर कार्रवाई करना पुलिस की जिम्मेदारी है और इसी मामले में अन्य आरोपियों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है।

सुवेंदु अधिकारी के सीट छोड़ने से हो रहा उपचुनाव

नंदीग्राम सीट से 2026 विधानसभा चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने जीत दर्ज की थी। भवानीपुर सीट से भी जीतने के बाद उन्होंने नंदीग्राम सीट छोड़ दी, जिसके चलते यहां उपचुनाव हो रहा है। नंदीग्राम 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के कारण पश्चिम बंगाल की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

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