सोनीपत, 13 अक्टूबर। भारत और कनाडा के बीच दलहन प्रोटीन अनुसंधान, खाद्य प्रसंस्करण और नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। सोनीपत के कुंडली स्थित राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता एवं प्रबंधन संस्थान (NIFTEM-K) में कनाडा-इंडिया पल्स प्रोटीन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CIPPC) स्थापित करने की योजना है। संस्थान ने अगले एक वर्ष के भीतर इसकी स्थापना की दिशा में काम पूरा करने का लक्ष्य रखा है। इस केंद्र के माध्यम से संयुक्त शोध, नई खाद्य तकनीकों के विकास, प्रशिक्षण और उद्योगों के साथ साझेदारी को बढ़ावा दिया जाएगा।
भारत-कनाडा गोलमेज सम्मेलन में हुई सहयोग पर चर्चा
NIFTEM-K में सोमवार को ‘Pulse Protein Innovation, Value Addition and Strategic Partnerships’ विषय पर भारत-कनाडा गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें दोनों देशों के सरकारी प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों, शोध संस्थानों और उद्योग संगठनों ने भाग लिया। सम्मेलन में दलहन से प्रोटीन प्राप्त करने की तकनीक, खाद्य उत्पादों में मूल्य संवर्धन और टिकाऊ पोषण के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर विचार-विमर्श हुआ।
कनाडा के सस्केचेवान प्रांत के उन्नत शिक्षा मंत्री केन शेवलडेऑफ ने कहा कि भारत और सस्केचेवान के बीच उच्च शिक्षा, शोध, नवाचार और अकादमिक आदान-प्रदान को लेकर व्यापक संभावनाएं हैं। उन्होंने संस्थानों और उद्योग जगत से साझा प्राथमिकताओं पर मिलकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
एक साल में केंद्र स्थापित करने की दिशा में काम
NIFTEM-K के निदेशक डॉ. हरिंदर सिंह ओबरॉय ने कहा कि NIFTEM-K और यूनिवर्सिटी ऑफ सस्केचेवान के बीच हुए समझौते को अब ठोस परिणामों में बदलने की जरूरत है। इसी दिशा में अगले एक वर्ष के भीतर संस्थान में भारत-कनाडा पल्स प्रोटीन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने के लिए काम किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि इस पहल को आगे बढ़ाने के लिए स्पष्ट कार्ययोजना, समयबद्ध लक्ष्य और संबंधित संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाएगा। साथ ही, शुरुआती दो वर्षों के लिए प्रमुख शोध क्षेत्रों पर सहमति बनाने का प्रस्ताव है, ताकि सहयोग को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।
दलहन से नए खाद्य उत्पाद विकसित करने पर जोर
प्रस्तावित शोध कार्यक्रम में दलहन से प्रोटीन निकालने और उसके प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन तथा पौष्टिक खाद्य उत्पादों के विकास को प्राथमिकता दी जा सकती है। इसके अलावा संयुक्त शोध परियोजनाओं, विद्यार्थियों और शिक्षकों के आदान-प्रदान, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और साझा शोध वित्तपोषण पर भी काम करने की योजना है।
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने दलहन प्रसंस्करण से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों पर चर्चा की। इनमें कच्चे माल की गुणवत्ता में एकरूपता बनाए रखना, प्रसंस्करण के दौरान ऊर्जा की खपत कम करना, खाद्य उत्पादों की बनावट और उपयोगी गुणों को सुरक्षित रखना तथा उद्योगों के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल योग्य सामग्री विकसित करना शामिल है।
उद्योगों की भागीदारी से शोध को मिलेगा व्यावसायिक रूप
डॉ. ओबरॉय ने कहा कि इस पहल में उद्योग जगत की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण होगी। शोध के निष्कर्षों को ऐसी तकनीकों और उत्पादों में बदलने की जरूरत है, जिनका व्यावसायिक स्तर पर उपयोग किया जा सके। इससे खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में नए बाजार और कारोबार के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।
सम्मेलन में यूनिवर्सिटी ऑफ सस्केचेवान, पल्स कनाडा, सस्केचेवान पल्स ग्रोअर्स, अल्बर्टा पल्स ग्रोअर्स और शास्त्री इंडो-कैनेडियन इंस्टीट्यूट सहित कई कनाडाई संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल हुए। भारत की ओर से ICAR-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पल्सेज रिसर्च, ICRISAT, इंडिया पल्सेज एंड ग्रेन्स एसोसिएशन, IIT दिल्ली, गुड फूड इंस्टीट्यूट इंडिया और न्यूट्रिशन इंटरनेशनल सहित विभिन्न संस्थानों तथा उद्योग प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
प्लांट-बेस्ड न्यूट्रिशन और तकनीकी नवाचार पर साझा रणनीति
गोलमेज सम्मेलन में मूल्य संवर्धित दलहन खाद्य पदार्थों, टिकाऊ पोषण, पौधों पर आधारित खाद्य उत्पादों, तकनीकी विकास और शोध के व्यावसायीकरण पर विशेष जोर दिया गया। प्रतिभागियों ने भारत और कनाडा की शोध विशेषज्ञता, बुनियादी सुविधाओं तथा औद्योगिक क्षमताओं को एक साथ लाकर दलहन प्रोटीन क्षेत्र में नई संभावनाएं विकसित करने पर सहमति जताई।
सम्मेलन के समापन पर दोनों पक्षों ने चर्चा को स्पष्ट प्राथमिकताओं, जिम्मेदारियों और समयसीमा से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। प्रस्तावित दो-वर्षीय शोध रोडमैप को संयुक्त अनुसंधान, खाद्य नवाचार और अकादमिक-औद्योगिक सहयोग को मजबूत बनाने की दिशा में अहम कदम माना गया।
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