Delhi High Court Decision On POCSO Case Muslim Personal Law: पॉक्सो (नाबालिग पत्नी के साथ सेक्स) के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ की आड़ में आरोपी को पॉक्सो केस में राहत देने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट से सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि पॉक्सो से ऊपर मुस्लिम पर्सनल लॉ नहीं है। कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत कानून POCSO एक्ट और भारतीय न्याय संहिता  में बच्चों को दिए गए कानूनी संरक्षण को खत्म नहीं कर सकता। जस्टिस संजीव नरूला की बेंच ने यह फैसला सुनाया।

दरअसल ये पूरा मामला नाबालिग लड़की से शादी और यौन संबंध बनाने का है। शादी के समय मुस्लिम लड़की की उम्र 16 साल और मुस्लिम युवक की उम्र 28 साल थी। शादी के बाद दोनों साथ रहने लगे और महिला गर्भवती हो गई। गर्भावस्था के दौरान सरकारी अस्पताल में जांच के समय उसकी उम्र सामने आई जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया था।

पुलिस ने युवक के खिलाफ BNS की धारा 64(1) और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया था। पति-पत्नी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर FIR रद्द करने की मांग की थी। साथ ही पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई और कथित उत्पीड़न के लिए मुआवजे की भी मांग की थी। महिला ने कोर्ट में कहा कि शादी उसकी मर्जी और दोनों परिवारों की सहमति भी थी। उसने किसी तरह के दबाव या जबरदस्ती से इनकार किया। उसने पति की जमानत का समर्थन करते हुए गर्भावस्था के दौरान उसके साथ रहने की अनुमति की मांग भी की।

शादी से उम्र नहीं बढ़ जाती- दिल्ली हाईकोर्ट

सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्टशादी होने से नाबालिग की उम्र 18 साल नहीं हो जाती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जो लड़की शादी से पहले 16 साल की थी वह शादी के बाद भी 16 साल की ही रहेगी। POCSO और BNS के तहत यौन संबंध के मामले में उसकी उम्र ही सबसे अहम तथ्य है। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार युवावस्था प्राप्त कर चुकी मुस्लिम लड़की शादी करने में सक्षम हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि शादी की वैधता और शादी के बाद नाबालिग से यौन संबंध बनाने के आपराधिक परिणाम दो अलग-अलग सवाल हैं। भले ही शादी को पर्सनल लॉ के तहत वैध मान लिया जाए इससे POCSO या BNS के तहत अपराध खत्म नहीं होता। कोर्ट ने साफ किया कि 18 साल से कम उम्र की लड़की से शादी करने के बाद उसके साथ यौन संबंध बनाने पर पति को सिर्फ इस आधार पर आपराधिक कार्रवाई से छूट नहीं मिल सकती कि शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुई थी।

FIR रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार

इन दलीलों के आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई और मुआवजे की मांग भी खारिज कर दी। यानी नाबालिग से शादी और उसके साथ यौन संबंध के मामले में सिर्फ पर्सनल लॉ में शादी को वैध बताना आपराधिक मुकदमे से बचने का आधार नहीं हो सकता।

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