ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने भारत के नए बजट में चाबहार पोर्ट जिसे ‘गोल्डन गेट’ भी कहा जाता है उसके लिए फंडिंग न रखे जाने पर निराशा जताई है. उन्होंने कहा कि ये फैसला भारत और ईरान दोनों के लिए ही निराशाजनक है. हालांकि, अरागची की टिप्पणी से लगता है कि ईरान अभी भी भारत के साथ काम करना चाहता है और पोर्ट को आगे बढ़ाने की उम्मीद रखता है.

‘गोल्डन गेट’ के लिए बजट न देना निराशाजनक: अरागची

एक टीवी इंटरव्यू में जब अरागची से पूछा गया कि क्या भारत के इस साल के बजट में चाबहार को शामिल न करने से निराशा हुई है तो अरागची ने जवाब दिया, ‘मुझे लगता है कि ये ईरान और भारत दोनों के लिए निराशाजनक है.’ उन्होंने चाबहार पोर्ट को ‘गोल्डन गेट’ बताया, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले कहा था. अरागची के मुताबिक, ये पोर्ट भारतीय महासागर क्षेत्र को मध्य एशिया, काकेशस और यूरोप से जोड़ता है. अगर इसे पूरी तरह विकसित कर लिया जाए तो भारत के लिए ईरान के रास्ते मध्य एशिया, काकेशस और यूरोप तक पहुंचने का सबसे अच्छा ट्रांजिट रूट बन सकता है. उन्होंने उम्मीद जताई कि एक दिन ये पोर्ट पूरी तरह विकसित हो जाएगा.

भारत अभी भी पोर्ट का प्रमुख डेवलपमेंट पार्टनर बना हुआ है. एक्सटर्नल अफेयर्स मिनिस्ट्री के स्पोक्सपर्सन रणधीर जायसवाल ने पिछले महीने कहा था कि भारत अमेरिका के साथ चाबहार से जुड़े मुद्दों पर बात कर रहा है.

पाकिस्तान को दरकिनार कर देगा भारत

चाबहार पोर्ट ईरान के दक्षिण-पूर्वी प्रांत सिस्तान-बलूचिस्तान में स्थित है. भारत और ईरान ने मिलकर इसे विकसित किया है ताकि बिना पाकिस्तान से गुजरे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधा ट्रेड और ट्रांजिट रूट बने. ये प्रोजेक्ट भारत की रीजनल कनेक्टिविटी बढ़ाता है, लैंडलॉक्ड मध्य एशियाई देशों तक ट्रेड को बढ़ावा देता है और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर चीन के प्रभाव को काउंटर करता है. 2024 में भारत और ईरान के बीच बड़ी डील हुई थी, जिसके तहत भारत ने पोर्ट के डेवलपमेंट में हिस्सा लिया. पिछले बजट्स में भारत हर साल करीब 100 करोड़ रुपये आवंटित करता रहा है.

आम बजट में चाबहार के लिए ‘नो अमाउंट’

हालांकि, 2026-27 के यूनियन बजट में पहली बार चाबहार पोर्ट के लिए कोई फंड नहीं रखा गया. ये फैसला ऐसे समय में आया जब अमेरिका-ईरान के बीच तनाव बढ़ा हुआ है. सितंबर 2025 में अमेरिका ने ईरान पर सख्त सैंक्शंस लगाए, लेकिन भारत को छह महीने की छूट दी गई थी, जो अप्रैल 2026 में खत्म हो रही है.

चाबहार पोर्ट भारत के लिए क्यों जरूरी?

चाबहार भारत की स्ट्रैटेजिक पोजिशन के लिए बहुत अहम है. ये प्रोजेक्ट न सिर्फ ट्रेड बढ़ाता है बल्कि भारत को मध्य एशिया तक पहुंचने का वैकल्पिक रास्ता देता है. हालांकि, अमेरिकी सैंक्शंस और जियोपॉलिटिकल प्रेशर के कारण भारत ने बजट में फंडिंग रोक दी है, जो एक तरह का बैलेंस्ड अप्रोच दिखाता है.

ईरान के राजदूत ने भी पहले कहा था कि वो भारत के साथ चाबहार पर काम करने के लिए तैयार हैं. अभी भारत की तरफ से कोई ऑफिशियल कमेंट नहीं आया है, लेकिन ये मुद्दा दोनों देशों के रिश्तों में एक चुनौती बना हुआ है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि आगे चलकर सैंक्शंस की स्थिति और अमेरिका के साथ बातचीत के आधार पर चाबहार का फ्यूचर तय होगा.

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