दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने एक अहम फैसले में 2015 की एक रेल दुर्घटना से जुड़े मुआवजा मामले में यात्री की अपील खारिज कर दी है। इस यात्री को कथित तौर पर ट्रेन से गिरने के बाद अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े थे। यात्री ने दावा किया था कि ट्रेन में अत्यधिक भीड़ होने के कारण वह सोनीपत और नई दिल्ली रेलवे स्टेशनों के बीच सफर के दौरान गलती से नीचे गिर गया। इस हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हुआ और बाद में उसके दोनों हाथ काटने पड़े। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का आकलन करने के बाद यात्री के दावे को स्वीकार नहीं किया और मुआवजे की मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि यह मामला रेलवे अधिनियम के तहत “अनटुवर्ड इंसीडेंट” (दुर्घटनावश घटना) की श्रेणी में साबित नहीं होता।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने कहा कि रिकॉर्ड में दर्ज घटना स्थल और यात्री के बयान में गंभीर अंतर है, जो मामले की जड़ को प्रभावित करता है। अदालत के मुताबिक, जब बुनियादी तथ्य ही साबित नहीं हो पाए, तो इस घटना को “दुर्घटनावश घटना” (Untoward Incident) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

कोर्ट ने 25 मार्च को अपने आदेश में उस अपील को खारिज कर दिया, जो यात्री ने रेलवे दावा अधिकरण के फैसले के खिलाफ दायर की थी। अधिकरण ने 2018 में ही यात्री के मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अधिकरण के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है। इस फैसले के साथ ही यह साफ हो गया है कि रेलवे इस मामले में मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं होगा।

दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल अपील में यात्री ने बताया कि मार्च 2015 में वह एक वैध सेकंड क्लास टिकट लेकर सोनीपत रेलवे स्टेशन से झांसी जाने के लिए मालवा एक्सप्रेस में सवार हुआ था। अपीलकर्ता के अनुसार, ट्रेन में अत्यधिक भीड़ थी और इसी कारण वह सोनीपत और नई दिल्ली रेलवे स्टेशनों के बीच सफर के दौरान अचानक ट्रेन से नीचे गिर गया। इस हादसे में उसे गंभीर चोटें आईं, जिनके चलते उसकी दोनों कोहनियों के नीचे के हाथ काटने पड़े।

जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने पाया कि जहां एक ओर अपीलकर्ता ने दावा किया कि वह सदर बाजार के पास ट्रेन से गिरा था, वहीं लोक नायक अस्पताल के रिकॉर्ड में घटना का स्थान पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 10 बताया गया है। अदालत ने यह भी नोट किया कि संबंधित ट्रेन उस प्लेटफॉर्म से गुजरी ही नहीं थी। इसके अलावा, समय को लेकर भी बड़ा अंतर सामने आया। रेलवे रिकॉर्ड के मुताबिक घटना की सूचना रात करीब 1:30 बजे मिली, जबकि अपीलकर्ता का कहना था कि हादसा शाम करीब 6:30 बजे हुआ था।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि इतनी गंभीर चोटें जिनके चलते दोनों हाथ काटने पड़े—होने के बावजूद किसी व्यक्ति का इतने लंबे समय तक बिना इलाज या देखभाल के जीवित रहना सामान्य परिस्थितियों में स्वीकार करना मुश्किल है। अदालत ने इसे एक “महत्वपूर्ण परिस्थिति” बताया, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी के आधार पर कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता का दावा संदेह से परे साबित नहीं होता और इसे “अनटुवर्ड इंसीडेंट” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मौजूदा मामले में घटना के तरीके (manner of incident) से जुड़े बुनियादी तथ्य ही साबित नहीं हो पाए हैं। ऐसे में इस दावे को रेलवे अधिनियम के तहत “अप्रत्याशित घटना” (Untoward Incident) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने अपने फैसले में कहा कि रेलवे दावा अधिकरण ने जो निष्कर्ष निकाला था, वह सही और तथ्यों पर आधारित है। ट्रिब्यूनल ने पहले ही यह माना था कि कथित घटना अधिनियम में दी गई “अप्रत्याशित घटना” की परिभाषा के दायरे में नहीं आती।

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