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‘मुर्क्षित भाव’
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जंगल जंगल बात चली है पता चला है, चड्डी पहन के फूल खिला है फूल खिला है. यकीन मानिए कि एक कारपोरेशन में काम करने वाले इस ठेकेदार की हैसियत साल 2013 तक चड्डी पहनने भर की थी. मगर भाजपा के एक शीर्षस्थ नेता की मेहरबानी से जब से फूल खिला है, हालात बदल गए हैं. वैसे तो यह फूल भाजपा सरकार में ही खिल गया था, मगर कांग्रेस सरकार के दिनों में इसकी खुशबू बिखरने लगी, जो भी इसकी भीनी-भीनी खुशबू के प्रभाव में आता, मुर्क्षित हो जाता. मुर्क्षित होने के बाद मालूम पड़ता कि खुशबूदार समझ जिस फूल को नर्म हाथों से पकड़ा था, यह धतूरे का फूल था. साल 2013 में महज पांच-सात करोड़ रुपये की हैसियत वाला यह ठेकेदार कांग्रेस सरकार में लोगों को मुर्क्षित करते-करते एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार करने लग गया. कहा जाता है कि शासन और कारपोरेशन में एक चपरासी से लेकर शीर्षस्त अफसर तक उसकी तनख्वाह पर थे. सरकारी तनख्वाह से ज्यादा उसकी तनख्वाह का वजन था. सरकार बदली-हालात बदल गए. करीब पांच सौ करोड़ का भुगतान लेना बाकी था. भुगतान अटकता देख ठेकेदार ने मुर्क्षित करने वाले अपने फूलों से बने गुलदस्ते से नेता-मंत्रियों से लेकर अफसरों तक की चाकरी शुरू कर दी. कुछ धतूरे के उन फूलों की खुशबू से मुर्क्षित हो गए, कुछ को जुकाम था सो असर नहीं हुआ. जो मुर्क्षित थे, उनके प्रभाव में ठेकेदार को 30 करोड़ का भुगतान कर दिया गया. इससे पहले लंबित भुगतान को लेकर कारपोरेशन और ऊपर बैठे अफसरों के बीच चिट्ठी पत्री शुरू हुई. यह पूछा गया कि जिसके विरुद्ध जांच चल रही हो, क्या उसे भुगतान करना उचित होगा? मुर्क्षित भाव में सब ठीक ही लगता है. हरी झंडी दे दी गई.
‘बांस की सीढ़ी’
मुर्क्षित भाव में बैठे कुछ अफसर हैं, जो बांस की सीढ़ियों का इस्तेमाल कर विभाग का निजाम बनने का सपना पाले बैठे हैं. ठेका का टेका इन्हीं के जिम्मे होगा, यह सोचकर ठेकेदार भी कोई कसर नहीं छोड़ रहा. बांस ढोते-ढोते कारपोरेशन का बड़ा ठेकेदार बन गया था, सो बांस की सीढ़ियां बनाने का हुनर इसे पहले से ही आता है. सीढ़ियां बनाई जा रही है. मंसूबे पूरे करने के लिए. उधर एक तबका है, जो सीढ़ियों को अपनी आरी से काटने बैठा है. इधर सीढ़ियों का एक पाया जुड़ता, दूसरा अपने औजार के साथ काट बैठता. मानों सांप-सीढ़ी का खेल चल रहा हो. बहरहाल विभाग में एक घृतराष्ट्र भी हैं, जिनकी आंखों पर पट्टी बांधकर अनुचित फैसलों पर मुहर लगवाई जा रही है. घृतराष्ट्र सज्जन व्यक्ति हैं. कुछ मामलों में अंजान हैं और कुछ मामलों में नजर फेर लेते हैं. खैर इस अधूरे धतूरे कांड का अध्याय एक बड़े सौदे की दहलीज पर पहुंचकर खत्म होगा. यह तय है.
‘तबादले’
चुनावी नतीजों के साथ ही ब्यूरोक्रेसी में एक अहम बदलाव की खबर है. कलेक्टर से लेकर एसपी तक बदले जाएंगे. कई जिलों में सत्ताधारी दल के विधायक अपने इलाकों के कलेक्टर और एसपी से मुंह फुलाये बैठे हैं. कुछ ने तो बकायदा सीएम से मिलकर उन्हें हटाए जाने का राग अलाप दिया है. विधायकों के इंटेंशन से सरकार वाकिफ भी है, बावजूद इसके लग रहा है कि कुछ विधायकों की सुनी जाएगी. कुछ आईएएस हैं, जो बड़े जिलों पर टकटकी निगाह जमाए बैठे हैं. ऐन केन प्रकारेण कुर्सी कैसे साधी जा सके, इस पर गुणा भाग चल रहा है. एक आईएएस को लेकर यहां तक टिप्पणी सुनी गई है कि उन्होंने उन ठेकेदारों को मोटी रकम तैयार रखने का इशारा दे दिया है, जिन्हें अपनी कलेक्टरी के दिनों में खूब उपकृत किया था. वैसे उनकी बैच के कुछ और अफसर भी हैं, जो उम्मीद से जी रहे हैं कि उनका बैकग्राउंड उन्हें कुर्सी दिलाएगा. इधर आईपीएस बिरादरी में भी कई अफसर हैं, जो एसपी बनने व्याकुल हुए जा रहे हैं. इनसे से कुछ ने एक-दो मौजूदा एसपी का कच्चा चिट्ठा जुटा रखा है. जरूरत पड़ने पर सरकार से साझा किया जा सकता है. फिलहाल तो अटकलों का बादल है, 4 जून के बाद छटता दिखेगा.
‘एग्जिट पोल’
एग्जिट पोल आ गया. इसके रुझान देख भाजपा नेताओं की बांछे खिल गई हैं. नतीजों में थोड़ा भी कुछ ऊपर नीचे होता, तो आलाकमान की तिरछी नजर का शिकार होना पड़ता. 400 पार का नारा लगाने वाली भाजपा के लिए एक-एक सीट बेहद महत्वपूर्ण है. एग्जिट पोल से फिलहाल तो राहत मिल गई है. नहीं तो इससे पहले तक भाजपा के भीतरखाने की चर्चा में यह बात कही जाती रही कि राजनांदगांव, कांकेर, कोरबा, जांजगीर चांपा और सरगुजा जैसी सीटों पर कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी है. राजनांदगांव सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. हालांकि एग्जिट पोल के आने के बाद भी कांग्रेस नेता दावा कर रहे हैं कि बघेल एक लाख वोट के अंतर से चुनाव जीत सकते हैं. इसी तरह जांजगीर चांपा में प्रत्याशी रहे शिव डहरिया जातिगत समीकरण के बूते अपनी जीत का सपना देख रहे हैं. इस सीट पर दावा किया जा रहा है कि दलित वोट, जो बीएसपी का कोर वोट है, वह कांग्रेस में शिफ्ट हुआ है. कोरबा सीट से नेता प्रतिपक्ष डाॅ. चरणदास महंत की पत्नी ज्योत्सना महंत दोबारा मैदान में है. यहां महंत की चुनावी रणनीति और भाजपा उम्मीदवार सरोज पांडेय के बाहरी होने के समीकरण के बूते जीत का दावा किया जा रहा है. कोरबा को लेकर यह भी सुना जा रहा है कि गोंगपा का वोट बैंक कांग्रेस में शिफ्ट कराया गया है. सरगुजा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार शशि सिंह का आंकलन है कि समाजिक समीकरण और चिंतमणि महाराज के दल बदलने के खेल की वजह से उनका पलड़ा भारी हो सकता है. कांकेर सीट से बिरेश ठाकुर दूसरी बार मैदान में हैं. उनके अपने दावे हैं. इन सभी दावों के बरक्स भाजपा का एकजुट होकर चुनाव लड़ना कहीं राज्य में नया इतिहास न रच दे. बहरहाल 4 जून तय करेगा कि विधानसभा में बुरी तरह पीट चुकी कांग्रेस को लोकसभा के नतीजे सिर उठाने का मौका देंगे या नहीं.
‘उत्तराधिकारी कौन?’
रायपुर दक्षिण विधानसभा सीट के खाली होने से भाजपाईयों में खुशी की लहर है. बृजमोहन अग्रवाल की जीत को लेकर किसी को कोई संशय नहीं. संशय इस बात को लेकर है कि रायपुर दक्षिण का उत्तराधिकारी कौन होगा? दावेदारों ने अपनी-अपनी दावेदारी पेश कर दी है. सुनील सोनी, संजय श्रीवास्तव, केदार गुप्ता, नरेश गुप्ता, नंदन जैन, मीनल चौबे, अनुराग अग्रवाल, अमित साहू सरीखे कई नाम हैं, जिन्हें लेकर चर्चा सुनी जा रही है. इन दावेदारों में एक नाम पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल का भी सुना गया है. सीट एक-दावेदार अनेक वाले हालात बन गए हैं. संभावित उप चुनाव के लिए प्रत्याशी तय करने में बृजमोहन अग्रवाल की कितनी सुनी जाएगी. यह भी अहम होगा. बृजमोहन का कहा कट जाए, इस बात की भी संभावना कम ही है. बृजमोहन अग्रवाल को लेकर पार्टी में यह कहा जाता है कि वह कुछ बना पाए या ना बना पाए, बिगाड़ने का माद्दा जरूर रखते हैं. लाजमी है कि पार्टी उनके संदर्भ में लिए जाने वाले फैसले के पहले एक बार जरूर सोचती है.