पावर सेंटर : IAS की खरी-खरी….शराब के व्यापार में नेताजी !…..’जयचंद’ कौन?…सड़क पर नेताजी…- ✍🏻 आशीष तिवारी

Column By- Ashish Tiwari , Resident Editor

IAS की खरी-खरी

कभी-कभी कुछ अप्रत्याशित घटना घट जाती है. जब इन घटनाओं का निचोड़ निकाला जाए, तो फजीहत ही हाथ लगती है. एक सुपर सीनियर आईएएस ऐसी ही फजीहत का शिकार हो गए. वैसे भी इन दिनों उनके ग्रह-नक्षत्र कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहे. कोर्ट-कचहरी की गुत्थमगुत्थी ने माथे पर चिंता की लकीरें उकेर रखी है. बहरहाल किस्सा ताजा-ताजा है. हुआ यूं कि सुपर सीनियर आईएएस साहब एक सरकारी बिल्डिंग के एक्सटेंशन का जायजा लेने पहुंचे थे. जायजा था, सो मातहत अधिकारियों की पूरी फौज खड़ी थी. बात-बात पर गुस्से को अपनी नाक पर रखने वाले साहब का चेहरा जायजे के साथ लाल हुआ जा रहा था. गुस्से का कोई ठहराव था नहीं. तो फट पड़ा. अपने अधीनस्थ एक आईएएस अधिकारी को बोल पड़े, “ये सब वाहियात काम बंद करो. हमें मालूम है कि कमीशनखोरी के चक्कर में सब हो रहा है”. बाकी सब तो ठीक था. अधीनस्थ आईएएस को ये ‘कमीशनखोरी’ वाली बात नागवार गुजरी. अधिकारी कायदे के आदमी थे, सो कायदे से पेश आए. साहब को थोड़ा करीब बुलाया और धीरे से कहा, “दोबारा ये बात आप मत ही कहना”. इस टिप्पणी के बाद सीनियर साहब ने बग़ैर कोई टिप्पणी दर्ज किए वहाँ से लौटने में ही भलाई समझी. पुराने पन्ने उलटे जाते तो कमीशनखोरी के एक चर्चित किस्से की गूंज सुनाई पड़ जाती.
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शराब के व्यापार में नेताजी !

यूँ ही नहीं कहते शराब आत्मविश्वास देता है. ईमानदारी और सच्चाई सामने लाकर रख देता है. शराब की यही खूबी कांग्रेस के एक दिग्गज नेताजी ने अपने भीतर समाहित कर ली है. तभी तो राज्य में सियासत का सबसे बड़ा मुद्दा बने ‘शराब’ से उनकी यारी हो गई. पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ नेताजी मुनाफ़े के इस कारोबार में घुस रहे हैं. वैसे तो ब्राह्मणत्व के सारे गुण नेताजी में मौजूद हैं. खुद शराब नहीं पीते, लेकिन अब पिलाने के कारोबार में उनकी दिलचस्पी पर लोगों की नजरें टेढ़ी हो रही हैं. एक कंपनी की शराब राज्य में बेचने का राइट नेताजी ने खरीद लिया है. सुना है कि उनकी कंपनी कॉर्पोरेशन में लिस्टेड भी हो गई है. नेताजी ज्ञानी पुरुष हैं. उनके ज्ञान के आगे अच्छे-अच्छे नहीं टिकते. राजनीति में तब से हैं, जब सूबे के कई मंत्री सियासत का ककहरा सीख रहे थे. ज़ाहिर है, कारोबार में आने के पहले सभी नफ़ा-नुक़सान का खाका खींच लिया होगा.
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कारोबारियों का रोना

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से नियमकानून की पेचीदगी ने कारोबारियों को पहले से परेशान कर रखा था कि इधर छत्तीसगढ़में अब कच्चे के हिसाबकिताब में बरती जा रही ईमानदारी ने हालाकान कर रखा है. कोयले की कालिख से सियासत की चमक बढ़ानेवाला नया फार्मूला बड़ी मुसीबत लेकर आएगा इसकी भनक भी कारोबारियों को ना थी. एक कारोबारी की माने तो बहुचर्चित राॅयल्टीकी अदायगी का बकायदा लेखाजोखा रखा जा रहा है. वह भीएक्सेल शीटपर. बताते हैं कि ईडीआईटी तक इसकी शिकायतपहुंचा दी गई है. सो ईडीआईटी की सीधी नजर भी है. हालांकि सांठगांठ मजबूत है, फिर भी नजर कब टेढ़ी हो जाए, भला कौन जानताहै? अब कहा जा रहा है कि कारोबारियों ने शर्त रख दी है कि बहुचर्चित राॅयल्टी राज्य के बाहर पटाई जाएगी. कारोबारियों ने कहा हैकि रॉयल्टी देने में उन्हें किसी तरह की दिक्कत नहीं है, लेकिन ईडीआईटी का डंडा कब चल जाएगा, ये डर सता रहा है.

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मुख्यमंत्री ने बीजेपी में ढूंढ लिया अपना ‘जयचंद’

‘पावर सेंटर’ के इसी काॅलम में हमने बताया था कि कलेक्टर-एसपी कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दो टूक कहा था कि बीजेपी के सभी दिग्गज नेता इस दफे चुनाव में किनारे लगा दिए जाएंगे. अब बीजेपी के भीतर भी ऐसी ही हलचले दिखाई पड़ रही है. बीजेपी के प्रमुख रणनीतिकार बताते हैं कि 15 सालों तक सत्ता का स्वाद चख चुके लगभग सभी सीनियर चेहरों को आने वाले चुनाव में बिठाने की योजना पर संगठन काम कर रहा है. अब तक जिन चेहरों के बूते राज्य में बीजेपी की पहचान थी, धीरे-धीरे उन्हें ठिकाने लगा दिया जाएगा. कुछ बहुत सीनियर नेता राज्यसभा भेज दिए जाएंगे, तो कुछ संगठन में जिंदगी खपाएंगे. बताते हैं कि बीजेपी की प्रमुख कमेटियों में अब 50 साल के नीचे उम्र के नेताओं को तरजीह दिए जाने की कवायद शुरू हो गई है. पार्टी की रिसर्च कमेटी, चुनाव प्रबंधन कमेटी समेत कई बड़ी और मजबूत कमेटियों में 50 साल से नीचे के उम्र वाले आक्रामक नेताओं को जगह दी जा रही है. वह भी चुपचाप. जाहिर है, बीजेपी इसके जरिए संकेत दे रही है. पिछले दिनों बीजेपी की एक बैठक में भी जब एक सीनियर नेता ने कहा कि चुनाव पास आ गया है, पिछली हार को अपने ऊपर हावी नहीं करना है. वर्ल्ड कप से भारतीय टीम भी बाहर हो गई थी, लेकिन न्यूजीलैंड के साथ हुए सीरीज के तीनों मैच भारतीय टीम ने मैच जीत लिया. इस पर तपाक से एक कार्यकर्ता ने तंज भरे अंदाज में कहा था कि, खिलाड़ी बदल दिए गए थे. खैर बीजेपी के परे सबसे अहम सवाल यही है कि मुख्यमंत्री तक भीतर की जानकारी कैसे पहुंच रही. सियासत के माहिर खिलाड़ी मुख्यमंत्री ने क्या बीजेपी में अपना ‘जयचंद’ ढूंढ लिया है.
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पीएम आवास योजना का गणित

पीएम आवास योजना के 7 लाख 81 हजार से ज्यादा आवास केंद्र ने वापस लिए, तो राज्य की सियासत में बड़ा बखेड़ा शुरू हो गया. बीजेपी ने सरकार पर सवालों की झड़ी लगा दी, इस आरोप के साथ की सरकार की लापरवाही से गरीबों के घर अब नहीं बन पाएंगे. अब आंकड़ों में समझते हैं, दरअसल मामला है क्या? केंद्र सरकार ने 7 लाख 81 हजार 999 आवास वापस लिए. 1 लाख 20 हजार प्रति आवास की दर से कुल राशि 9 हजार 383 करोड़ रुपए होती है. अब इसमें केंद्र सरकार की ओर से दिए जाने वाला केन्द्रांश 72 हजार रुपए प्रति आवास के हिसाब से गणना करें, तो कुल 5 हजार 630 करोड़ रुपए होते हैं. राज्य को प्रति आवास 48 हजार रूपए राज्यांश के रूप में देने थे. कुल आबंटित आवास यानी 7 लाख 81 हजार 999 के अनुपात में राज्यांश करीब 3 हजार 750 करोड़ रुपए होता है. अब जरा मनरेगा का हिसाब जोड़ लें. एक आवास के काम के लिए यदि 90 मेनडेज कार्य मिलता है. लगभग 18 हजार प्रति आवास के अनुपात में गणना की जाए, तो 7 लाख 81 हजार 999 कुल आवास के हिसाब से करीब 1407 करोड़ रुपए होते हैं. इनमें शौचालय निर्माण के लिए 938 करोड़ रूपए जोड़ दिया जाए, तो 11 हजार 728 करोड़ रुपए की एक बड़ी राशि होती है. केंद्र ने 2021-22 के लिए आबंटित इन मकानों को वापस ले लिया है. इधर आवास वापस लिए जाने के केंद्र के फैसले पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री के नाम से योजना है, तो केंद्र का योगदान 90 फीसदी और राज्य का 10 फीसदी होना चाहिए ना कि 60-40. बहरहाल गरीबों के आवास बनते तो 11 हजार करोड़ रूपए से ज्यादा मार्केट में आता, सैकड़ों को रोजगार मिलता. सरकार को 18 फीसदी जीएसटी अलग. इधर केंद्र राज्य पर और राज्य केंद्र पर सवाल उठा रहा है.
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सड़क पर आए नेताजी

जैसे-जैसे चुनाव करीब आता जा रहा है. बीजेपी नेताओं के तौर तरीके बदल रहे हैं.  अपने सोफिस्टिकेटेड रहन-सहन के लिए पहचाने जाने वाले पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर भी बदले-बदले नजर आ रहे हैं. कवर्धा मामले में जब कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई, तो वहां पहुंचने में देरी नहीं की. शहर के बाहर पुलिस ने रोका, तो सड़क पर ही अपने साथी विधायक शिवरतन शर्मा के साथ धरने पर बैठ गए. अभी दो दिन पहले जब बीजेपी के सांसद-विधायक सीएम हाउस घेरने निकले, तब भी पुलिस के रोके जाने पर नेताजी सड़क पर बैठ गए. नेताजी मझे हुए खिलाड़ी हैं. बखूबी जानते हैं कि ऊपर नंबर बढ़ाना है, तो यहां नीचे सड़क पर आना होगा. सो सड़क में बैठने से उन्हें कोई गुरेज नहीं. वैसे एक खासियत यह भी है कि विधानसभा में सरकार के खिलाफ एकतरफा बैटिंग करते वक्त विराट कोहली बन जाते हैं.  तो ट्विटर पर आक्रामक ट्विट के जरिए चर्चाओं में बने रहते हैं. संगठन के भीतर लोग कहते हैं, सरकार को जवाब देने के लिए अकेले हमारा ‘अजय’ काफी है….
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