राकेश चतुर्वेदी की कलम से

सरकारी कैंटीन, रिश्तेदारों का नमकीन!

सरकारी दफ्तरों में सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल कैसे होता है, इसकी एक बानगी दीपावली के ठीक पहले देखने को मिली. वाकया दीपावली की छुट्टियां घोषित होने से दो दिन पहले का है. साहब का फरमान आया कि कैंटीन में मिक्स नमकीन तैयार किया जाए. आदेश क्या हुआ, पूरी कैंटीन काम पर लग गई. देखते ही देखते करीब 10-12 किलो नमकीन तैयार हो गया. अब बारी थी पैकिंग की. अचानक निर्देश मिले कि आधा-आधा किलो के पैकेट बनाए जाएं. कर्मचारियों ने भी पूरी मुस्तैदी से पैकिंग का काम निपटा दिया. अब असली कहानी तो इसके बाद शुरू हुई. कर्मचारियों को लगा होगा कि नमकीन कैंटीन में ही इस्तेमाल होगा या फिर दफ्तर के लोगों में बंटेगा. लेकिन अचानक फरमान आया कि सारे पैकेट पार्किंग में खड़ी साहब की गाड़ी में रखे जाएं. फिर क्या था, ड्राइवर की निगरानी में एक-एक पैकेट गाड़ी में पहुंचा दिया गया. देखते ही देखते कैंटीन में तैयार हुआ पूरा नमकीन साहब की गाड़ी के रास्ते रवाना हो गया. अब यह नमकीन दफ्तर के कर्मचारियों के हिस्से आया या साहब के रिश्तेदारों और करीबियों के यह तो वही जानें. लेकिन खबर है कि नमकीन रिश्तेदारों में बांटने के लिए तैयार हुआ था.

मंत्रीजी का उत्तराधिकारी आ रहा है

मध्य प्रदेश के एक सीनियर मिनिस्टर ने लगता है कि अपने राजनीतिक करियर की पेटी पैक करने की तैयारी शुरू कर दी है. हालांकि, यह फैसला किसी दबाव में नहीं, बल्कि परिस्थितियों को देखते हुए खुद मंत्रीजी ने ही किया है. मंत्रीजी को अब अपने सियासी सफर की अगली कड़ी परिवार के भीतर ही नजर आ रही है. लिहाजा, उत्तराधिकारी के तौर पर बेटे को क्षेत्र में पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा सक्रिय कर दिया गया है. वैसे मतदाताओं के बीच मंत्रीजी की मौजूदगी तो रहती ही है, लेकिन अब क्षेत्र के कार्यक्रमों से लेकर लोगों के बीच मेल-मुलाकात तक बेटे की सक्रियता भी बढ़ा दी गई है. संदेश साफ है कि पिता के साथ-साथ बेटे को भी अपना लीजिए. मंत्रीजी की तैयारी है कि अगली विधानसभा में उनकी जगह बेटे का खाता खुल जाए और सियासत की विरासत अगली पीढ़ी को सौंप दी जाए. हालांकि ऐसा नहीं है कि पुत्र किसी महत्वपूर्ण पद पर न हो. पद तो है लेकिन अब विधानसभा का उत्तराधिकारी पद दिलाना है. अब देखना यह है कि मंत्रीजी की यह सियासी विरासत हस्तांतरण की तैयारी कितनी आगे बढ़ती है. फिलहाल इतना बता दें कि उत्तराधिकारी वाली बात मालवा में नहीं, प्रदेश के किसी दूसरे इलाके की है.

मैडम की दावत, बिल का झंझट

भोपाल के सरकारी गलियारों में इन दिनों एक साहब की मैडम खूब सुर्खियां बटोर रही हैं. चर्चा है कि मैडम को शहर के नामी होटलों में लजीज पकवानों का स्वाद लेने का खासा शौक है. होटल पहुंचना, पसंदीदा व्यंजन मंगवाना और जमकर दावत उड़ाना तो उनकी दिनचर्या का हिस्सा बताया जाता है. अब असली कहानी खाने की मेज पर नहीं, बिल आने के बाद शुरू होती है. किस्सा यह है कि भुगतान की बारी आते ही मैडम अफसर पति के पद और रसूख का हवाला देने लगती हैं. ऐसे में होटल संचालक भी असमंजस में पड़ जाते हैं कि बिल मांगें तो आखिर किससे और कैसे. मैडम की मेहमान नवाजी पूरी हो जाती है, लेकिन होटल वालों के लिए हिसाब-किताब अधूरा रह जाता है. इस पूरे किस्से का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि साहब का महकमा ही आम लोगों की थाली में परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी निभाता है. यानी दूसरों की थाली का हिसाब रखने महकमे के साहब के घर की दावतों का हिसाब ही चर्चा में है.

खाली कर दो रास्ते राजा साहब के वास्ते

राजनैतिक बिसात में नारे सब कुछ कह जाते हैं. नारों के शब्दों के आधार पर सियासी मायने भी निकाल लिए जाते हैं. ताजा मामला नए नारे को लेकर है, जो विधायक पुत्र ने पूर्व मुख्यमंत्री के लिए दिया है. नारा है खाली कर दो रास्ते राजा साहब के वास्ते. विधायक पुत्र का अपने पिता के लिए लगाया गया नारा खूब सुर्खियां बटौर रहा है. नारे को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. यह नारा पिता की ओर से अपना साफा उतारकर बेटे को पहनाने के बाद पुत्र का पिता के प्रति प्रेम है या नारे के मायने कुछ और ही हैं.

Follow the LALLURAM.COM MP channel on WhatsApp
https://whatsapp.com/channel/0029Va6fzuULSmbeNxuA9j0m