चंडीगढ़। सड़क दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मौत होने पर पीड़ित परिवार को मुआवजा देने के लिए चालक की लापरवाही साबित करना हर स्थिति में अनिवार्य नहीं है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने करीब 26 साल पुराने एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए मृतक मुन्ना के परिजनों को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। अदालत ने मुआवजे की राशि पर याचिका दायर करने की तारीख से भुगतान होने तक छह प्रतिशत सालाना ब्याज देने का भी निर्देश दिया है।
इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों में साक्ष्यों का मूल्यांकन आपराधिक मुकदमों की तरह कठोर मानकों पर नहीं किया जाता। दुर्घटना, वाहन की संलिप्तता और मौत के बीच संबंध परिस्थितियों तथा उपलब्ध साक्ष्यों से स्थापित होने पर पीड़ित परिवार को कानूनी राहत मिल सकती है।
2000 में हुआ था हादसा, इलाज के दौरान गई जान
यह मामला 25 अप्रैल 2000 का है। मुन्ना पलवल से साइकिल पर जा रहा था, तभी एक कार ने उसे टक्कर मार दी। हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे पहले नागरिक अस्पताल, पलवल में भर्ती कराया गया, लेकिन हालत गंभीर होने के कारण सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली रेफर कर दिया गया। वहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
घटना के बाद कार चालक के खिलाफ पलवल थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई। इसके बाद मृतक की पत्नी, बेटे और मां ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, फरीदाबाद में मुआवजे के लिए याचिका दायर की।
हालांकि, अधिकरण ने 16 नवंबर 2002 को परिवार का दावा खारिज कर दिया। अधिकरण का कहना था कि कार चालक की लापरवाही साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए गए थे। इसके बाद परिजनों ने इस फैसले को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने बताया, दुर्घटना के मामलों में कैसे परखे जाते हैं सबूत
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस परमोद गोयल ने कहा कि मोटर दुर्घटना से जुड़े मुआवजे के मामलों में तथ्यों को संभावनाओं के आधार पर परखा जाता है। यहां सबूतों का स्तर किसी आपराधिक मुकदमे में दोष साबित करने जितना कठोर नहीं होता।
अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों का आकलन करते हुए पाया कि हादसे के दिन ही प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पुलिसकर्मी द्वारा पेश प्राथमिकी और मृत्यु से संबंधित दस्तावेजों से दुर्घटना में कार की संलिप्तता और चोटों के कारण मुन्ना की मौत होने की पुष्टि हुई।
अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर भी मामले का आकलन किया और माना कि केवल चालक की लापरवाही साबित करने के लिए पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं होने के आधार पर परिवार को राहत से वंचित करना उचित नहीं था।
पुराने हादसों पर भी लागू हो सकता है धारा 164 का प्रावधान
इस मामले का महत्वपूर्ण कानूनी पहलू मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164 से जुड़ा है। यह प्रावधान निर्धारित परिस्थितियों में वाहन दुर्घटना से मृत्यु या गंभीर चोट होने पर बिना गलती साबित किए मुआवजे का आधार प्रदान करता है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रावधान से संबंधित संशोधन प्रक्रियात्मक प्रकृति का है और इसका लाभ एक अप्रैल 2022 से पहले हुई दुर्घटनाओं के मामलों में भी दिया जा सकता है।
इसी आधार पर अदालत ने मृतक के परिजनों की याचिका को धारा 164 के तहत स्वीकार करते हुए पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
बीमा कंपनी को करना होगा भुगतान, छह फीसदी ब्याज भी मिलेगा
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि परिवार को पांच लाख रुपये की मुआवजा राशि पर याचिका दायर करने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक छह प्रतिशत सालाना ब्याज भी दिया जाए। भुगतान की प्राथमिक जिम्मेदारी बीमा कंपनी की होगी। अदालत ने परिजनों की अपील स्वीकार कर ली।
आम लोगों के लिए क्या है इस फैसले का महत्व?
यह फैसला सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवारों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी संदेश देता है। मुआवजे के दावे में केवल चालक की लापरवाही से जुड़े साक्ष्यों पर ही नहीं, बल्कि दुर्घटना की परिस्थितियों, प्राथमिकी, चिकित्सा एवं मृत्यु संबंधी दस्तावेजों और अन्य उपलब्ध तथ्यों पर भी विचार किया जा सकता है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर दुर्घटना में स्वतः पांच लाख रुपये मुआवजा मिलेगा। राहत संबंधित कानूनी प्रावधान, मामले के तथ्यों और अदालत के आकलन पर निर्भर करती है। इस मामले में हाईकोर्ट ने पुराने हादसे के बावजूद मृतक के परिवार को राहत देते हुए स्पष्ट किया कि उचित कानूनी आधार होने पर केवल साक्ष्यों के कठोर मानक के कारण पीड़ित परिवार को मुआवजे से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
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