Rajasthan High Court Default Bail: राजस्थान हाईकोर्ट ने डिफॉल्ट जमानत की याचिकाओं पर देरी रोकने के लिए सभी सत्र न्यायाधीशों को निर्देश दिए हैं कि तय अवधि में आरोप पत्र पेश नहीं होने से जुड़ी ऐसी अर्जियों को उसी दिन सुनवाई के लिए रखा जाए।

जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने अशोक कुमार को जमानत पर रिहा करने के आदेश भी दिए। वहीं, SBI अधिकारियों से जुड़े कथित रिश्वत मामले में FIR दर्ज नहीं करने पर हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की कार्यशैली पर सवाल उठाए और विस्तृत जांच के निर्देश दिए।

डिफॉल्ट जमानत की याचिका पर उसी दिन सुनवाई

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोप पत्र दाखिल करने की निर्धारित अवधि बीतने के बाद डिफॉल्ट जमानत के लिए प्रार्थना पत्र पेश किया जाता है, तो संबंधित अधिकारी या लिपिक उस पर तारीख और समय दर्ज करेगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि मामले में आरोप पत्र पेश हुआ है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे प्रार्थना पत्र सुनवाई के लिए उसी दिन पेश किए जाएं। इन निर्देशों का उद्देश्य डिफॉल्ट जमानत से जुड़ी अर्जियों के निस्तारण में अनावश्यक देरी रोकना है।

90 दिन में आरोप पत्र पेश नहीं हुआ, फिर भी बढ़ी न्यायिक अभिरक्षा

अशोक कुमार की ओर से पेश याचिका में अधिवक्ता कपिल शर्मा ने बताया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ टोडाभीम थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ था। याचिका के अनुसार, संबंधित अपराधों में आजीवन कारावास का प्रावधान होने के कारण आरोप पत्र पेश करने की अवधि 90 दिन थी। यह अवधि 6 अगस्त को पूरी हो गई थी।

इसके बावजूद निचली अदालत ने न्यायिक अभिरक्षा जारी रखते हुए सुनवाई 25 अगस्त तक टाल दी। याचिकाकर्ता ने 18 अगस्त को डिफॉल्ट जमानत के लिए प्रार्थना पत्र दिया, जिसे 20 अगस्त को सुनवाई के लिए रखा गया। उसी दिन पुलिस ने आरोप पत्र पेश कर दिया। याचिका के मुताबिक, निचली अदालत ने यह मानते हुए 2 सितंबर को जमानत अर्जी खारिज कर दी कि आरोप पत्र पहले ही पेश हो चुका था। इसके बाद हाईकोर्ट ने मामले में अशोक कुमार को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए।

SBI अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के निर्देश

एक अन्य मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने SBI के अधिकारियों से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और रिश्वत के मामले में FIR दर्ज नहीं करने पर ACB की कार्यशैली पर सवाल उठाए। जस्टिस अशोक कुमार जैन ने विवेक शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए SBI के उप महाप्रबंधक और मुख्य प्रबंधक-एचआर के खिलाफ FIR दर्ज कर विस्तृत जांच करने के आदेश दिए।

कोर्ट ने कहा कि आरोपों की पुष्टि होने के बावजूद FIR दर्ज नहीं करना गंभीर मामला है। अदालत की टिप्पणी के अनुसार, ऐसी स्थिति से आरोपियों को बचाने का प्रयास होने का आभास होता है।

51 लाख रुपये के फर्जी हाउसिंग लोन की अनियमितता उजागर करने का दावा

याचिका में अधिवक्ता मोहित खंडेलवाल ने बताया कि याचिकाकर्ता SBI में मुख्य प्रबंधक था। उसने भिवाड़ी शाखा में 51 लाख रुपये के फर्जी हाउसिंग लोन से जुड़ी अनियमितता उजागर की थी। आरोप है कि मामला सामने लाने के बाद उसे प्रताड़ित किया गया और आरोप खत्म करने के लिए 40 लाख रुपये की रिश्वत मांगी गई। याचिका के अनुसार, नवंबर 2022 में की गई शिकायत पर ACB ने सत्यापन किया और ट्रैप कार्रवाई के दौरान रकम भी बरामद की। इसके बावजूद FIR दर्ज नहीं की गई। आरोप है कि संबंधित अधिकारियों को क्लीन चिट देकर शिकायतकर्ता के खिलाफ ही कार्रवाई शुरू कर दी गई।

ACB की शुरुआती जांच प्रक्रिया पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने कहा कि ACB के महानिदेशक ने FIR दर्ज करने के बजाय प्रारंभिक शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया था। अदालत के सामने रखे गए तथ्यों के अनुसार, मांग के सत्यापन और ट्रैप कार्रवाई के बाद FIR दर्ज करने की जरूरत थी, लेकिन नियमित जांच की जगह मामला बंद करने का प्रयास किया गया। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद संबंधित SBI अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कर विस्तृत जांच की जानी है। दोनों मामलों में अदालत के निर्देश न्यायिक प्रक्रिया में समयबद्ध कार्रवाई और भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच से जुड़े हैं।

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