सुशील खरे, रतलाम। शारदीय नवरात्रि की पावन बेला में धर्म नगरी रतलाम में बंगाल की सांस्कृतिक छटा बिखर गई है। बंगाली समाज रतलाम द्वारा आयोजित किए जाने वाले श्री सार्वजनिक दुर्गा पूजा महोत्सव का यह निर्बाध 53वां वर्ष है। वर्ष 1974 में कालिका माता मंदिर प्रांगण से प्रारंभ हुई यह भव्य परंपरा विगत अनेक वर्षों से श्री रामकृष्ण विवेकानंद आश्रम, जवाहर नगर, रतलाम में अत्यंत श्रद्धा, आस्था और हर्षोल्लास के साथ निभाई जा रही है। बंगाली समाज की यह दुर्गा पूजा अपनी विशिष्ट, प्राचीन और जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं के लिए पूरे अंचल में विशेष पहचान रखती है।
धुनुची नृत्य, 108 दीपक और सिंदूर खेला हैं मुख्य आकर्षण
इस नौ दिवसीय भव्य उत्सव के दौरान कई ऐसे धार्मिक और पारंपरिक अनुष्ठान होते हैं, जो हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इस पूरे उत्सव का सबसे बड़ा और मुख्य आकर्षण ‘धुनुची नृत्य’ है, जो दुर्गा पूजा की आरती का सबसे ऊर्जावान रूप माना जाता है। धूप, ढाक की गूंज और शक्ति की भक्ति के इस संगम का मुख्य शुभारंभ दुर्गा पूजा के विशेष दिनों में होता है। मान्यता है कि भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले सबसे पहले इस प्रकार की पूजा की थी।
क्या है धुनुची नृत्य और इसकी मान्यता?
आयोजकों के मुताबिक ‘धुनुची’ मिट्टी का एक विशेष पात्र होता है, जिसमें नारियल की जटा, धुना यानी लोबान और कपूर जलाया जाता है। इससे उठने वाला सुगंधित धुआँ पूरे वातावरण को पवित्र कर देता है। ऐसी मान्यता है कि यह धुआं नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर माँ दुर्गा के आगमन के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। इस दौरान भक्त जलती हुई धुनुची को दोनों हाथों में, कई बार दांतों से पकड़कर और सिर पर संतुलित कर पारंपरिक ढाक की थाप पर ऊर्जावान नृत्य करते हैं। इसके अलावा 108 दीपकों से सजी संधि पूजा और विजया दशमी पर होने वाला ‘सिंदूर खेला’ इस आयोजन के अन्य मुख्य आकर्षण होते हैं।
16 से 21 अक्टूबर तक चल रहे हैं धार्मिक अनुष्ठान
समाज एवं पूजा कमेटी के अध्यक्ष डॉ. त्रिदीप बैनर्जी ने जानकारी देते हुए बताया कि इस वर्ष दुर्गा पूजा महोत्सव के सभी पारंपरिक और धार्मिक अनुष्ठान 16 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक श्रद्धापूर्वक संपन्न हो रहे हैं। बंगाली समाज के युवाओं और महिलाओं, विशेषकर धुनुची नृत्य करने वाली प्रज्ञा विश्वास व अन्य कलाकारों द्वारा इस प्राचीन संस्कृति को मंच पर पूरी भव्यता के साथ जीवंत किया जा रहा है। नौ दिनों तक मां के नौ रूपों की आराधना के बाद अष्टमी और नवमी की संध्या पर हुए इन आयोजनों ने पूरे रतलाम शहर को भक्तिमय बना दिया है।

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