दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग (Election Commition) की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब केजरीवाल और उनके परिवार के चार अन्य सदस्यों को दिल्ली में चल रही SIR प्रक्रिया के तहत नोटिस जारी किया गया है। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, इन मतदाताओं के रिकॉर्ड पिछले SIR के आंकड़ों से मेल नहीं खाने के कारण उन्हें ‘Unmapped with Last SIR’ श्रेणी में रखा गया है।
केजरीवाल की 3 प्रमुख मांगें
केजरीवाल ने हालिया रिपोर्टों के आधार पर SIR को लेकर कड़ा आरोप लगाते हुए इसे आजाद भारत का ‘सबसे बड़ा स्कैंडल’ बताया। यह उनका राजनीतिक आरोप है। उन्होंने इस मुद्दे पर 3 प्रमुख मांगें रखीं। केजरीवाल ने मांग की है कि मौजूदा SIR प्रक्रिया को रद्द किया जाए और तीन साल पुरानी मतदाता सूची को बहाल किया जाए। दूसरी मांग में उन्होंने तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग की है। तीसरी मांग के तहत केजरीवाल ने कहा कि जिन राज्यों में चुनाव हो चुके हैं, वहां दोबारा चुनाव कराया जाए। उनके बयान में दिल्ली, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल का उल्लेख किया है।
SIR पर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट
एक रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के क्रियान्वयन की निगरानी तीनों चुनाव आयुक्तों की देखरेख में हो रही थी। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आधिकारिक रिकॉर्ड पर आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें 4 आपत्तियां एक ही दिन दर्ज होने की बात कही गई है। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, SIR के दौरान मतदाताओं से जुड़े फैसलों के खिलाफ अपील तथा मतदाता सूची के डेटा की निगरानी और सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल थे। दोनों आयुक्तों ने कुछ फैसलों और आदेशों को उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए जाने पर भी सवाल उठाए।
विपक्ष ने भी उठाए सवाल
SIR को लेकर विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया की आलोचना की है। विपक्ष की ओर से आरोप लगाया गया है कि इस प्रक्रिया के जरिए कुछ वर्गों के मतदाताओं को प्रभावित किया जा सकता है। हालांकि, ये राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के तौर पर नहीं माना जा सकता।
निर्वाचन आयोग ने क्या कहा?
वहीं, निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने आंतरिक मतभेद की रिपोर्ट पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि आयुक्तों की ओर से किसी मुद्दे पर अलग-अलग राय या आपत्ति दर्ज किया जाना आयोग के अंतिम फैसले से अलग बात है। आयोग के अनुसार SIR समेत सभी अंतिम फैसले तीनों आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार, संधू और जोशी ने अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची से नाम हटाने और मतदाता डेटा से जुड़े कुछ मुद्दे जरूर उठाए थे, लेकिन इन आपत्तियों को आयोग के अंतिम फैसलों पर औपचारिक असहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए: निर्वाचन आयोग
अधिकारियों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची को अपडेट और दुरुस्त करने के दौरान नाम हटाने तथा मतदाता डेटाबेस के प्रबंधन से जुड़े कुछ फैसलों पर अपनी चिंताएं जताई थीं। हालांकि, निर्वाचन आयोग के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) समेत आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं। इनमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त के साथ दोनों निर्वाचन आयुक्तों की भी मंजूरी शामिल रही है। अधिकारियों ने बताया कि निर्वाचन आयोग के कामकाज को नियंत्रित करने वाले कानून और सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि जहां तक संभव हो, आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए। यदि किसी मुद्दे पर सहमति नहीं बनती है तो नियमों के तहत बहुमत का मत प्रभावी होता है।
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