Rupee Hits Record Low : 9 मार्च को US डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 46 पैसे गिरकर 92.33 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया. यह भारी गिरावट दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी और मिडिल ईस्ट में बिगड़ते हालात के बीच डॉलर के मजबूत होने की वजह से हुई.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक जंग खत्म नहीं हो जाती, रुपया दबाव में रह सकता है. इस साल अब तक रुपया 2% से ज़्यादा गिर चुका है, जिससे यह 2026 में उभरते बाज़ारों में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी में से एक बन गया है.

ब्रेंट क्रूड $117 पर पहुंचा: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव से सप्लाई में रुकावट का डर बढ़ गया है. सोमवार को, ब्रेंट क्रूड की कीमतें 25% बढ़कर $117 प्रति बैरल के करीब पहुँच गईं.

50% की तेजी: ईरान के साथ जंग शुरू होने के बाद से, तेल की कीमतों में 50% से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है.

भारत पर असर: भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इम्पोर्ट करता है. तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से रिफाइनिंग कंपनियों को ज्यादा डॉलर देने पड़ रहे हैं, जिससे मार्केट में डॉलर की डिमांड बढ़ गई और रुपया कमज़ोर हो गया.

रुपया 92.19 पर खुला, लेकिन ट्रेडिंग शुरू होते ही गिर गया

पिछले गुरुवार की तरह, सोमवार को भी मार्केट खुलने से पहले रिज़र्व बैंक ने दखल दिया. इससे रुपया 92.19 पर खुला, जो मार्केट की उम्मीदों से थोड़ा बेहतर था. हालांकि, ट्रेडिंग शुरू होते ही इन्वेस्टर्स और तेल कंपनियों ने डॉलर खरीदना बढ़ा दिया. एक बैंक के करेंसी ट्रेडर ने कहा, “RBI यह मैसेज दे रहा है कि वह मार्केट पर नजर रख रहा है, लेकिन तेल की मौजूदा हालत को देखते हुए, इस समय डॉलर-रुपये की जोड़ी का गिरना मुश्किल है.”

डॉलर विदेशी इन्वेस्टर्स के लिए ‘सेफ हेवन’ बन गया है

मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध ने ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता पैदा कर दी है. इसलिए, इन्वेस्टर्स रिस्क लेने के बजाय अपना पैसा US डॉलर में इन्वेस्ट कर रहे हैं, जिसे सेफ हेवन माना जाता है.

BofA ग्लोबल रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “अगर यह जंग लंबे समय तक चलती है, तो तेल इंपोर्ट पर निर्भर देशों की करेंसी पर सबसे ज्यादा दबाव पड़ेगा. भारत (INR) और फिलीपींस (PHP) सबसे ज़्यादा कमजोर हैं.”

आम आदमी पर इसका क्या असर होगा?

विदेश में पढ़ाई और घूमने के बारे में सोचना: अगर आप या आपका कोई जानने वाला विदेश घूमने का प्लान बना रहा है, तो आपको डॉलर खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने होंगे.

इलेक्ट्रॉनिक्स और कच्चे माल की कीमतें: विदेश से इंपोर्ट होने वाले मोबाइल फोन, लैपटॉप और दूसरे पार्ट्स और महंगे हो सकते हैं, क्योंकि कंपनियां इनके लिए डॉलर में पेमेंट करती हैं.

पेट्रोल और डीजल की कीमतें: अगर कच्चा तेल महंगा बना रहा, तो भविष्य में देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी बढ़ सकती हैं.