Lalluram Special : स्कूल शिक्षा की उभर रही भयावह तस्वीर, दो लाख बच्चों ने स्कूलों से मुंह मोड़ा, कौन है जिम्मेदार…

सत्यपाल सिंह राजपूत, रायपुर। कोरोना काल में स्कूल फीस के बढ़ते दबाव और भविष्य की माली हालत में सुधार की गुंजाइश कम देखते हुए बड़ी संख्या में पालकों ने अपने बच्चों को निजी स्कूलों से निकाल लिया है. निजी स्कूल एसोसिएशन की माने तो स्कूल छोड़ने वालों की संख्या दो लाख तक पहुंच गई है. ऐसे में अब सरकार को स्वास्थ्य के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा पर भी ध्यान देने की जरूरत है.

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छत्तीसगढ़ प्रायेवट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने बताया कि 20 जिलों में उनका एसोसिएशन सक्रिय है, जहां लगभग 1 लाख 50 हजार बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं, इनमें से ऐसे भी बच्चे हैं, जिन्होंने स्कूल से नए शैक्षणिक सत्र के संबंध में अब तक संपर्क तक नहीं किया है. वे बताते हैं कि अगर औसत निकाला जाए तो स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या दो लाख से ज्यादा होगी, इसके अलावा शेष रह गए आठ जिलों का आंकड़ा अभी और सामने आना बाकी है.

राजीव गुप्ता जिलेवार आंकड़ों की जानकारी देते हुए बताते हैं कि पहली से लेकर 12वीं कक्षा तक अकेले रायपुर में 15 हजार बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं. वहीं बिलासपुर में 12 हजार, मुंगेली में 7 हजार, दुर्ग में 11 हजार, राजनांदगांव में 8 हजार, बालोद में 5 हजार, बालौदाबाजार में 8 हजार, बेमेतरा में 8 हजार, रायगढ़ में 6 हजार, महासमुंद में 6 हजार, सरगुजा में 5 हजार, बस्तर में 8 हजार, धमतरी में 9 हजार, गरियाबंद में 6 हजार, जांजगीर चांपा में 7 हजार, कांकेर में 6 हजार, कोरिया में 5 हजार, कोरबा में 8 हजार और कवर्धा में 7 हजार बच्चों के पालक टीसी निकाल चुके हैं. इसके अलावा बाकी जिलों की जानकारी ली जा रही है.

शिक्षा से वंचित न हो यह सरकार की जिम्मेदारी

उन्होंने कहा कि हम सरकार से अपील करते है कि इन बच्चों ने सरकारी स्कूल में प्रवेश लिया है या नही, या पढ़ाई छोड़ दिए है इसको ट्रेक करना बेहद जरूरी क्योंकी उनके साल ही नहीं बल्कि एक सदी पीछे जाने से रोका जा सकता है. साथ ही वे सरकारी कार्य प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकारी स्कूल की पहुंच भी कम है, और गुणवत्ता भी नहीं जितना प्रायवेट स्कूल दे रही है. अगर पिछले पांच साल की बात करें तो हर साल दो लाख से ज्यादा विद्यार्थी स्कूल छोड़ रहे हैं, इसकी शिक्षा विभाग के पास कोई जानकारी ही नहीं है. लेकिन बच्चे शिक्षा से वंचित ना हो ये सरकार की जिम्मेदारी है, स्कूलों को मिले आवेदन के आंकलन के आधार पर कहा जा सकता है कि आर्थिक तंगी से गुजर रहे पालक अपने बच्चों का टीसी ले रहे हैं.

आखिर आंकड़ों के पीछे का सच क्या है

वहीं प्रदेश पैरेंट एसोसिएशऩ के अध्यक्ष क्रिस्ट्रोफर पॉल ने इस आंकड़े के पीछे की सच्चाई जानने की बात कहते हैं. वे इस बात की जांच की मांग करते है कि क्या बच्चे स्वयं स्कूल छोड़ रहे हैं या निकाला गए हैं. प्रायवेट स्कूल ने आंकड़ा जारी किया इसमें कोई शक नहीं. वे कहते हैं कि जैसा इन्होंने फीस वसूलने के लिए पूरे प्रदेश में पालकों पर दबाव बनाया उसके आधार पर आंकड़ा और ज्यादा बढ़ सकते हैं. इसके साथ ही वे कहते हैं कि शिक्षा विभाग के पास बीते दो साल का कोई आंकड़ा नहीं है. साथ ही चेतावनी देते हैं कि इस मामले में अगर शिक्षा विभाग कार्रवाई नहीं करती है, तो वे हाईकोर्ट जाने को मजबूर होंगे.

कटघरे में सर्वशिक्षा अभियान

बच्चे जब स्कूल में प्रवेश लेते है तब उस बच्चे को यूडाइस कोर्ड जारी होता, वह उस बच्चे की पहचान होता है. इसी कोड के जारिए बच्चे को मॉनिटर किया जाता है. जब विद्यार्थी किन्ही कारणों से स्कूल छोड़ देता है तो सर्व शिक्षा अभियान विभाग इस बच्चे की पूरी जानकारी रखता है, और शाला छोडने का कारण और उसे पुनः स्कूल या शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की समुचित व्यवस्था करता है. केन्द्र सरकार शाला त्यागी बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए करोड़ों रुपए राज्य सरकार को भेजती है.

उच्चाधिकारी के पास भी आंकड़े नहीं

स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला का कहना है कि मेरे पास आंकड़ा नहीं है, लेकिन हम सभी बच्चों को प्रवेश दे रहें हैं, अगर कोई बच्चा सरकारी स्कूल प्रवेश लेना चाहते उसे प्रवेश दिया जाएगा. वहहीं पालकों का आरोप है कि फीस के कारण बच्चों को निकाला गया है, इस पर जांच की मांग की जता रही है. इस पर डॉ. शुक्ला का कहते हैं कि फीस को लेकर पालक कोर्ट गए हैं उनका हम समर्थन करते हैं, सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार है, ये संकल्प है.

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