मुकेश मेहता, बुधनी/सीहोर। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के बुधनी से स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलने वाला एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मामला सामने आया है। हाल ही में बुधनी हाईवे पर हुए एक भीषण सड़क हादसे में 24 से अधिक घायलों को इलाज के लिए बुधनी सिविल अस्पताल लाया गया था। लेकिन आपातकालीन स्थिति में अस्पताल के भीतर जिस तरह का उपचार और रवैया देखने को मिला, उसने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के दावों पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
बिना सुन्न किए टांके लगाने का गंभीर आरोप
हादसे में घायल हुई कुछ बच्चियों ने अस्पताल के स्टाफ पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बच्चियों का कहना है कि इलाज के दौरान उनके घावों पर बिना सुन्न किए (लोकल एनेस्थीसिया दिए बिना) ही टांके लगा दिए गए, जिससे उन्हें असहनीय दर्द से गुजरना पड़ा।
डॉक्टर की जगह आउटसोर्स कर्मचारी ने किया उपचार
मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब यह जानकारी सामने आई कि अस्पताल में घायलों के घाव सिलने और टांके लगाने का काम किसी प्रशिक्षित डॉक्टर या नियमित स्टाफ नर्स के बजाय अस्पताल में कार्यरत एक आउटसोर्स कर्मचारी द्वारा किया जा रहा था। अब यह सबसे बड़ा जांच का विषय है कि क्या अस्पताल में आपातकाल से निपटने के लिए कोई जिम्मेदार चिकित्सक मौजूद नहीं था और किस अधिकार के तहत आउटसोर्स कर्मचारी मरीजों का इलाज कर रहा था।
बीएमओ के बयान भी चर्चा और विवादों में
इस पूरे घटनाक्रम के बीच बुधनी सिविल अस्पताल के बीएमओ डॉ. धनजीत बड़ोदिया के बयान भी खासे चर्चा और सवालों के घेरे में आ गए हैं। जानकारी के अनुसार, मरीजों को ग्लूकोज की बॉटल लगाने के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कथित तौर पर यहां तक कह दिया कि यदि वे खुद बॉटल लगाएंगे तो वह निकल जाएगी, इसलिए स्टाफ नर्स को बुलाया जाता है। वहीं, मीडियाकर्मियों के साथ बातचीत के दौरान कथित रूप से “तुम लगा लो बॉटल” जैसी प्रतिक्रिया देना भी अस्पताल प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर खड़े हुए सवाल
सरकार भले ही शासकीय अस्पतालों में बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन बुधनी सिविल अस्पताल की इस घटना ने जमीनी हकीकत की पोल खोल दी है। 24 से अधिक घायलों के एक साथ अस्पताल पहुंचने जैसी आपात स्थिति में भी चिकित्सा प्रोटोकॉल की अनदेखी होना गंभीर चिंता का विषय है।
फिलहाल, पीड़ित परिजनों और आम नागरिकों ने जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि जांच में अस्पताल प्रबंधन या संबंधित कर्मचारियों की लापरवाही साबित होती है, तो उनके खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी अन्य मरीज को इस तरह की अमानवीय व्यवस्था का शिकार न होना पड़े।
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