पटना। बिहार में विधान परिषद चुनाव की आहट के साथ ही शिक्षकों की राजनीति एक बार फिर गरमाने लगी है। चुनाव जीतने के लिए विभिन्न प्रत्याशियों से लेकर स्वयं राज्य के शिक्षा मंत्री तक शिक्षकों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का लाभ देने के बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं। हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने इन वादों को महज़ एक चुनावी जुमला करार देते हुए राज्य भर के शिक्षकों को सतर्क रहने की कड़ी चेतावनी दी है।

​चुनावी वादों के पीछे की कड़वी सच्चाई

​बिहार प्रदेश कांग्रेस समिति के प्रवक्ता सह प्रदेश मीडिया संयोजक असित नाथ तिवारी ने सत्तारूढ़ दल और चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव के समय शिक्षकों को लुभाने के लिए सातवें वेतनमान की बातें की जा रही हैं, लेकिन मतदान खत्म होते ही ये तमाम नेता गायब हो जाएंगे। चुनाव के बाद इनमें से कोई भी नेता ‘सातवें वेतन’ का ‘सात’ शब्द तक बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा।

​समान काम के बदले समान वेतन का वादा खिलाफी

​कांग्रेस प्रवक्ता ने अतीत की घटनाओं का उल्लेख करते हुए याद दिलाया कि यह वही सत्ताधारी गिरोह है जिसने शिक्षकों को उनके अधिकारों से वंचित रखा। जब शिक्षकों ने ‘समान काम के लिए समान वेतन’ की जायज मांग उठाई, तो सरकार ने राहत देने के बजाय उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमेबाजी में घसीटा। पटना हाई कोर्ट में केस जीतने के बावजूद, राज्य सरकार के अड़ियल रवैये के कारण शिक्षक सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा हार गए।

​शिक्षक और शिक्षा विरोधी सोच का पर्दाफाश

​असित नाथ तिवारी ने भाजपा के दिवंगत नेता सुशील कुमार मोदी के पुराने बयान का हवाला देते हुए कहा कि इनके शीर्ष नेताओं ने सार्वजनिक रूप से कहा था धरती पर भगवान भी आ जाएं, तो भी शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा नहीं मिल सकता। इससे यह साफ जाहिर होता है कि इन दलों की मंशा कभी भी शिक्षकों को पूर्ण वेतनमान देने या राज्यकर्मी बनाने की नहीं रही है।

​शिक्षकों से सतर्क रहने की अपील

​तिवारी ने कहा कि शिक्षकों का वोट हासिल करने के लिए बार-बार नए जुमले उछाले जाते हैं। शिक्षक पहले भी कई बार धोखे का शिकार हो चुके हैं और इस चुनाव में भी उन्हें एक और बड़े छल की तैयारी दिख रही है। इसलिए राज्य के सभी शिक्षकों को इन शिक्षा-विरोधी ताकतों के बहकावे में आने से बचना चाहिए।