गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला द्वारा आरक्षण और मैला ढोने की प्रथा को लेकर दिए गए एक बयान ने राज्य में बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। नर्मदा जिले के सागबरा में आयोजित एक किसान सम्मेलन के दौरान वाघेला ने कहा कि जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं, यदि वे सवर्ण जातियों—जैसे पटेल, वाणिया (बनिया) और ब्राह्मण—के लोग आदिवासी समाज की तरह मैला (सफाई का कार्य) उठाएं, तो वे उन्हें अपनी तरफ से 50,000 रुपये प्रति महीना वेतन देने को तैयार हैं।
वाघेला के इस बयान के बाद राज्यभर में सवर्ण समाज और विभिन्न सामाजिक संगठनों का गुस्सा भड़क उठा है। राजकोट सहित गुजरात के कई हिस्सों में ब्रह्म समाज और पाटीदार समाज के युवाओं में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। सवर्ण संगठनों ने वाघेला को सार्वजनिक रूप से माफी मांगने के लिए 72 घंटे (3 दिन) का अल्टीमेटम दिया है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि बापू ने तय सीमा में माफी नहीं मांगी, तो उनके गांधीनगर स्थित आवास ‘वसंत वगडो’ पर उग्र विरोध प्रदर्शन किया जाएगा और पूरे राज्य में आंदोलन छेड़ा जाएगा।
जिस समय वाघेला ने यह विवादित टिप्पणी की, उस वक्त मंच पर गुजरात कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा और आदिवासी नेता महेश वसावा जैसे प्रमुख चेहरे मौजूद थे। इसके बावजूद, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) दोनों ही प्रमुख दलों ने फिलहाल इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि वाघेला का यह बयान ऐसे समय में आया है जब उनकी कांग्रेस पार्टी में दोबारा वापसी की अटकलें तेज हैं। 2017 में कांग्रेस छोड़ने वाले वाघेला बीजेपी, कांग्रेस और एनसीपी तीनों दलों में रह चुके हैं। इस तीखे बयान को कुछ लोग चुनावी गणित और वाघेला की राजनीतिक वापसी की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं, वहीं सवर्ण समाजों की सख्त प्रतिक्रिया ने उनकी राह मुश्किल कर दी है।
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