पटना। शरद पूर्णिमा का पावन पर्व इस वर्ष अत्यंत दुर्लभ और शुभ योगों के बीच मनाया जा रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, आज आश्विन शुक्ल पूर्णिमा तिथि, रेवती और अश्विनी नक्षत्र के युग्म संयोग तथा हर्षण योग के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग में आई है। इस शुभ फलदायी योग में किए गए कार्यों से विशेष सफलता की प्राप्ति होती है और खरीदारी करना भी बहुत शुभ माना गया है।
शरद पूर्णिमा के शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, आज पूजा-पाठ और अनुष्ठान के लिए कई विशेष मुहूर्त बन रहे हैं:
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:11 बजे से 11:56 बजे तक
- शुभ योग मुहूर्त: दोपहर 12:58 बजे से 02:23 बजे तक
- प्रदोष काल मुहूर्त: शाम 05:12 बजे से 07:53 बजे तक
- अमृत मुहूर्त: शाम 06:48 बजे से रात्रि 08:23 बजे तक
चंद्रमा की किरणों से होती है अमृत वर्षा
पौराणिक और वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी पर अमृत की वर्षा करता है। इस रात चंद्रमा के प्रकाश में विशेष औषधीय गुण मौजूद होते हैं, जो कई असाध्य रोगों को दूर करने में सक्षम हैं। यही कारण है कि इस रात्रि में लोग अपने घरों की छतों पर खीर रखते हैं, जिससे चंद्रमा की किरणें उस पर पड़कर उसे अमृत समान बना देती हैं। यह प्रसाद ग्रहण करने से मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और कफ, सर्दी-जुकाम, अस्थमा जैसी श्वास संबंधी परेशानियों से राहत मिलती है।
मां लक्ष्मी का पृथ्वी लोक पर आगमन और पूजा विधि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की ही रात माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था और इस रात माता लक्ष्मी स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर भ्रमण के लिए निकलती हैं। इसलिए इसे कोजागर पूर्णिमा भी कहा जाता है। सुख, सौभाग्य, आयु, आरोग्य और धन-संपदा की प्राप्ति के लिए इस दिन माता लक्ष्मी, कुबेर देव और भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है। भक्त रात्रि जागरण करते हैं, घी का चौमुखा दीपक पूरी रात जलाते हैं और विष्णुसहस्रनाम का पाठ करते हैं। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है और आर्थिक संकटों से छुटकारा मिलता है।
स्नान-दान और व्रत का महत्व
आज प्रदोष काल और निशीथ काल में पूर्णिमा होने के कारण रात्रि की पूजा का विशेष महत्व है। वहीं, सनातन परंपरा के अनुसार पवित्र गंगा स्नान, दान-पुण्य और व्रत की पूर्णिमा उदयातिथि के अनुसार कल सोमवार को मनाई जाएगी। चातुर्मास के शयनकाल का यह अंतिम चरण मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

