​दुर्गेश राजपूत, नर्मदापुरम। नर्मदांचल में निर्मित श्री- यंत्रों की पवित्रता, बेहतर माप (मेजरमेंट) और उत्कृष्ट गुणवत्ता ने अब विदेशों तक अपनी खास पहचान बना ली है। यहां बनने वाले सोने, चांदी और त्रि-धातु (सोना, चांदी और तांबा) से युक्त श्री यंत्रों की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिसके चलते इनकी मांग विदेशों में भी लगातार बढ़ रही है। ज्योतिषाचार्य विशाल महाजन के अनुसार, श्री- यंत्र भगवान शिव और शक्ति का संयुक्त स्वरूप है। जहां अन्य साधनाएं या तो भोग प्रदान करती हैं या मोक्ष, वहीं श्री साधना एक ऐसी विशिष्ट साधना है जिससे साधक को मोक्ष और भोग दोनों की एक साथ प्राप्ति होती है।

​विशेष निर्माण और शुद्धता का प्रावधान

नर्मदापुरम में इन श्री यंत्रों का निर्माण अत्यधिक शुभ मुहूर्तों में स्वयं की देखरेख में कास्टिंग और बेहतरीन फिनिशिंग के साथ किया जाता है। ज्योतिषाचार्य महाजन बताते हैं कि बाजार में उपलब्ध कई यंत्रों के मेजरमेंट (त्रिकोणीय स्थिति) में अशुद्धियां होने के कारण वे गलत ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं, इसलिए यहां निर्माण के दौरान माप और धातु के कॉम्बिनेशन का विशेष ध्यान रखा जाता है। शास्त्रों के अनुसार भोजपत्र पर बने यंत्र की आयु 10 से 15 वर्ष, तांबे पर 50 वर्ष, चांदी पर 100 वर्ष और स्वर्ण निर्मित यंत्र की आयु कई पीढ़ियों तक मानी गई है। त्रि-धातु से बने ये यंत्र नकारात्मकता को दूर करने में बेहद असरदार होते हैं।

​पुष्य नक्षत्र और दीपावली का विशेष योग

इन श्री यंत्रों के ऑर्डर मुख्य रूप से शारदीय नवरात्रि से पहले आ जाते हैं। इसके बाद मिलने वाले ऑर्डर्स को चैत्र नवरात्रि के समय प्रेषित किया जाता है। पुष्य नक्षत्र में विशेष पूजन-अर्चन और शुद्धिकरण के बाद इन्हें यजमानों को सौंपा जाता है। इस वर्ष भी दीपावली से पहले लगभग 12 से 13 श्री यंत्र विदेशी यजमानों के पास कूरियर या उनके परिजनों के माध्यम से भेजे जा रहे हैं। निर्माण में किसी भी प्रकार की त्रुटि या अशुद्धता पाए जाने पर उसे तुरंत अस्वीकार कर दिया जाता है, जिससे इनकी प्रामाणिकता और दिव्यता अक्षुण्ण बनी रहती है।

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