Dharm Desk :- दुर्गा पूजा के अंतिम दिन पश्चिम बंगाल में सिंदूर खेला की परंपरा खास आकर्षण का केंद्र रहती है । इस रस्म में सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करने के बाद एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाती है। लाल और सफेद साड़ियों में सजी महिलाओं, ढाक की थाप और मां दुर्गा की विदाई के भावुक दृश्यों से पूजा पंडालों का माहौल खास हो जाता है। विदाई के बेला में महिलाएं मां दुर्गा से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। देश के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी का पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा, जबकि पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपरा और विजयादशमी 21 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इसी दिन बंगाल के पूजा पंडालों में सिंदूर खेला की रस्म निभाई जाएगी।
सिंदूर खेला की शुरआत कैसे होती है
सिंदूर खेला के दिन महिलाएं पारंपरिक लाल बॉर्डर की सफेद साड़ी पहनकर दुर्गा पूजा पंडालों में पहुंचती है। सबसे पहले मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद महिलाएं देवी को सिंदूर, पान और मिठाई अर्पित करती है। मां को सिंदूर लगाने के बाद वे एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाकर इस रस्म में शामिल होती हैं। इस दौरान महिलाएं अपने परिवार की खुशहाली, पति की लंबी उम्र और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति की कामना करती हैं ।

परंपरा मां दुर्गा की विदाई से जुड़ी है
बंगाल में दुर्गा पूजा को मां दुर्गा के मायके आगमन और फिर अपने धाम लौटे की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। विजयादशमी के दिन माता की विदाई से पहले सिंदूर खेला आयोजित किया जाता है। रस्म के दौरान महिलाएं मां दुर्गा से अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करती हैं। बंगाली परंपरा में इसे ‘आशे बछोर आबार हॉबे’ कहा जाता है, जिसका भाव है कि अगले साल फिर मां का आगमन होगा। सिंदूर खेला के बाद मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है । इस दौरान पूजा पंडालों में उत्सव के साथ विदाई का भावुक छड़ भी दिखाई देता है। सिंदूर खेला के साथ दुर्गा पूजा का समापन होगा।

