EXCLUSIVE : राजकीय पशु वन भैंसा आशा की क्लोन दीपाशा जंगली नहीं, मुर्रा नस्ल की ? डीएनए मैपिंग नहीं कराने पर उठे सवाल, क्लोन पर 10 करोड़ खर्च !

रायपुर। छत्तीसगढ़ में राजकीय पशु वन भैंसा आशा की क्लोन दीपाशा की डीएनए मैपिंग नहीं कराने के बाद एक गंभीर सवाल उठ खड़ा हुआ है कि, वह वन भैंसा नहीं, बल्कि मुर्रा नस्ल की भैंस है ? मादा वन भैंसा दीपाशा को लेकर जो दावा किया जा रहा वह पूरी तरह से झूठ है ? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि, क्योंकि क्लोन से तैयार दीपाशा की डीएनए मैपिंग करने से बेंगलुरु से आई वन अनुसंधान टीम को रोक दिया गया.

दरअसल वन भैंसों के संवर्धन, संरक्षण को लेकर काम कर रही वन अनुसंधान की टीम छत्तीसगढ़ के दौरे पर थी. टीम संवर्धन और संरक्षण के लिए वन भैंसों का ब्लड सैंपल लेने की बात कही. वन विभाग की ओर से टीम को गरियाबंद में उदंती अभ्यारण्य स्थित 8 वन  भैंसों का सैंपल लेने दिया, लेकिन नवा रायपुर स्थित जंगल सफ़ारी के बाड़े रह रही क्लोन दीपाशा का ब्लड सैंपल नहीं लेने दिया गया.

ऐसा क्यो ? जब इस सवाल का जवाब जानने वन भैंसो के संरक्षण-संवर्धन के प्रभारी सीसीएफ रात्रे से बात की, तो उन्होंने कहा, कि इस बारे में वे ज्यादा कुछ नहीं बता सकते. उन्होंने कहा, जिनका आदेश था उतने की डीएएन मैपिंग हुई. क्लोन दीपाशा की डीएनए मैपिंग को लेकर आदेश नहीं था. क्यों नहीं था ? जब ये सवाल हमने किया, तो उन्होंने कहा, कि इसके बारे में मुझे नहीं पता. मैं इस बारे में जवाब नहीं दे सकता.

 

फोटो साभार : आलोक पुतुल

वहीं विभाग के सूत्र बताते हैं कि तथा-कथित वन भैंसा दीपाशा पर अब तक 10 करोड़ खर्च किया जा चुका है. गूगल सर्च करने पर बीबीसी सहित कुछ मीडिया रिपोर्ट्स सामने आती है, उनके मुताबिक क्लोन की डीएनए मैपिंग हुई ही नहीं. ऐसे में जिस तरह से वन अनुसंधान की टीम को डीएनए मैपिंग से रोका गया उससे यही लग रहा है कि जंगल सफ़ारी स्थित करोड़ों के बारे में रह रही दीपाशा वन भैंसा आशा की क्लोन नहीं है, बल्कि वह मुर्रा नस्ल की भैंस है !

हालांकि 2014 में वन विभाग की ओर से यह दावा किया गया कि ‘आशा’ नाम की यह एक मादा वन भैंस से करनाल स्थित नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट में ‘दीपाशा’ नामक क्लोन मादा वन भैंस का जन्म हुआ. दावा यह भी कि दुनिया में किसी वन्य जीव की यह पहली क्लोनिंग है. इसका उसी समय ही डीएनए मैपिंग करा लिया गया था.

फिलहाल सवाल तो यही उठ रहा है कि राजकीय पशु के नाम पर कहीं कोई बड़ा फर्जीवाड़ा तो नहीं हुआ है ? क्योंकि जब वन विभाग का दावा पुख्ता है, तो फिर बेंगलुरु से आई वन अनुसंधान टीम से डीएनए मैपिंग नहीं कराने की पीछे वजह क्या है ? अब सच क्या है इस बारे में पता तभी चल सकता, जब इसमें सरकार कोई जाँच कराएगी !

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