Dharm Desk : हिंदू परंपरा में शंख की आवाज को शुभता सकारात्मकता और मंगल का प्रतीक मानते है। यही कारण है कि कई घरों में दिवाली के दिन लक्ष्मी पूजन के समय शंखनाद की परंपरा निभाई जाती है। लेकिन सवाल यह है कि दिवाली की रात शंख बजाने के पीछे क्या धार्मिक महत्व है? माता लक्ष्मी की पूजा में शंख को इतना महत्वपूर्ण स्थान क्यों दिया गया है और पूजा के दौरान इसे बजाने का सही समय क्या है?

समुद्र मंथन से जुड़ा है शंख का महत्व

पौराणिक कथाओं में शंख का संबंध समुद्र मंथन से जोड़ा जाता है। समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में मां लक्ष्मी का भी प्राकट्य हुआ था। शंख को भी समुद्र से उत्पन्न माना गया है। इसी कारण शंख का संबंध माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु दोनों से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। धार्मिक परंपराओं में भगवान विष्णु के चार आयुधों में शंख का महत्वपूर्ण स्थान है । उनके हाथ में सुशोभित पांचजन्य शंख धर्म, विजय और मंगल का प्रतीक होते है।

लक्ष्मी पूजा में शंखनाद क्यों है खास

दिवाली की रात माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष विधान है। इस पूजा में शंखनाद को शुभ आरंभ और मंगल ध्वनि का प्रतीक माना जाता है।शंख की पवित्र ध्वनि से वातावरण में सकारात्मकता का संचार होता है। पूजा के दौरान शंख बजने से घर का वातावरण भक्तिमय बनता है। यही कारण है कि मंदिरों से लेकर घरों तक आरती और पूजा के समय शंखनाद की परंपरा देखने को मिलती है।

दक्षिणावर्ती शंख का मां लक्ष्मी से संबंध

शंख कई प्रकार के होते है।जिनमें दक्षिणावर्ती शंख को माता लक्ष्मी से विशेष रूप से संबंधित है। इसका मुंह दाईं ओर खुलता है। इसे धन, वैभव और समृद्धि का प्रतीक भी कहते है। वहीं सामान्य पूजा में वामा वर्ती शंख का भी उपयोग होता है। दक्षिणा वर्ती शंख को विशेष पूजन सामग्री के रूप में घर के मंदिर में स्थान दिया जाता है।

शंखनाद दीपावली की रात कब करें

लक्ष्मी पूजन के दौरान पूजा की शुरुआत और आरती के समय शंखनाद का विशेष महत्व है। पूजा संपन्न होने के बाद आरती के साथ शंख बजाना चाहिए। शंख को जल से साफ करके पूजा स्थल पर रखना शुभ माना जाता है। पूजा में शंख का उपयोग करते समय उसकी पवित्रता और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।