Automobile Desk – भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में जब भी किफायती ड्राइविंग की बात आती है, तो सीएनजी (CNG) गाड़ियों का नाम सबसे पहले दिमाग में आता है। सड़कों पर दौड़ती ज्यादातर सीएनजी कारें पेट्रोल इंजन के साथ आती हैं। सीएनजी न केवल जेब पर हल्की पड़ती है, बल्कि माइलेज के मामले में भी जबरदस्त फायदा देती है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि जो तकनीक ट्रकों, बसों और भारी व्यावसायिक वाहनों में डीजल के साथ मिलकर शानदार काम कर रही है, वही ‘डीजल-सीएनजी’ कॉम्बिनेशन हमारी रोज़मर्रा की पैसेंजर कारों से पूरी तरह नदारद क्यों है?

इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है पेट्रोल और डीजल इंजनों की बनावट और उनके काम करने के मूल सिद्धांत का अंतर। पेट्रोल इंजन में ईंधन को जलाने के लिए ‘स्पार्क प्लग’ लगा होता है, जो हवा और सीएनजी के मिश्रण को आसानी से चिंगारी देकर जला देता है। इसके विपरीत, डीजल इंजन में कोई स्पार्क प्लग नहीं होता। इसमें हवा को अत्यधिक दबाव (Compression) के जरिए गर्म किया जाता है, जिससे डीजल अपने आप सुलग उठता है। समस्या यह है कि सीएनजी केवल हवा के दबाव और गर्मी से इतनी आसानी से नहीं जलती।
यही वजह है कि भारी वाहनों में जब डीजल-सीएनजी सिस्टम लगाया जाता है, तो वह 100% सीएनजी पर नहीं चल पाता। उसमें सीएनजी को जलाने के लिए थोड़ी मात्रा में डीजल का छिड़काव करना ही पड़ता है, जिसे ऑटोमोबाइल भाषा में ‘पायलट फ्यूल’ कहते हैं। इसे पूरी तरह सीएनजी व्हीकल कहने के बजाय ‘डुअल-फ्यूल सिस्टम’ कहना ज्यादा सही होगा।
अब सवाल उठता है कि अगर यह तकनीक ट्रकों में चल रही है, तो छोटी पैसेंजर कारों में क्यों नहीं? तो इसकी सबसे बड़ी वजह है जटिल इंजीनियरिंग और जगह की कमी। एक नॉर्मल डीजल कार में सीएनजी सेटअप फिट करने के लिए हाई-प्रेशर पाइपलाइन, रेगुलेटर, एडवांस कंट्रोल यूनिट (ECU), अलग-अलग सेंसर और दोनों ईंधनों के संतुलन के लिए जटिल ट्यूनिंग की जरूरत होती है। साथ ही, डीजल के मुकाबले सीएनजी की ऊर्जा क्षमता थोड़ी कम होती है, इसलिए अच्छी ड्राइविंग रेंज हासिल करने के लिए कार में बड़ा और भारी सिलेंडर रखना पड़ेगा। इससे कार के बूट स्पेस (डिक्की) की जगह खत्म हो जाएगी और गाड़ी का वजन भी काफी बढ़ जाएगा।
दूसरी और सबसे व्यावहारिक चुनौती है लागत का गणित। बाजार में पहले से ही डीजल कारें, पेट्रोल कारों के मुकाबले काफी महंगी मिलती हैं। ऊपर से कड़े उत्सर्जन मानकों (जैसे BS6) के चलते डीजल इंजनों में पहले से ही DPF और DEF (अडब्लू) जैसे महंगे सिस्टम लगे होते हैं। अगर इस महंगे डीजल इंजन के ऊपर जटिल सीएनजी किट का भारी-भरकम खर्च भी जोड़ दिया जाए, तो कार की अंतिम कीमत इतनी ज्यादा हो जाएगी कि कोई भी आम खरीदार उसे लेना पसंद नहीं करेगा।
कमर्शियल गाड़ियों (ट्रक और बस) की रोजाना की रनिंग सैकड़ों किलोमीटर होती है, जिससे वे अपनी शुरुआती मोटी लागत को ईंधन की बचत से बहुत जल्दी वसूल कर लेते हैं। लेकिन एक आम कार मालिक की सीमित रनिंग को देखते हुए, डीजल-सीएनजी कार की बढ़ी हुई कीमत और उसकी जटिल मेंटेनेंस का गणित पूरी तरह फेल हो जाता है। यही मुख्य कारण है कि वाहन निर्माता कंपनियां पैसेंजर कार सेगमेंट में इस प्रयोग से बचती रही हैं।



