अमित पाण्डेय, खैरागढ़ | छुईखदान में 1953 के ऐतिहासिक गोलीकांड की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम ने गुरुवार शाम एक नए आंदोलन का संकेत दे दिया. शहीदों की स्मृति में जलाए गए हजारों दीयों के बीच छुईखदान की जनता ने एक स्वर में मांग उठाई है कि भले ही जिले के नाम से छुईखदान हटा दिया जाए, लेकिन छुईखदान को विधानसभा का दर्जा हर हाल में मिलना चाहिए.

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग जुटे, जहां मंच से सिर्फ अतीत को याद नहीं किया गया, बल्कि भविष्य की लड़ाई का ऐलान भी हुआ. इस आयोजन की खास बात यह रही कि यहां किसी राजनीतिक दल का झंडा नहीं दिखा. भाजपा, कांग्रेस सहित विभिन्न दलों के कार्यकर्ता और आम नागरिक बिना दलगत पहचान के, सिर्फ क्षेत्र के अधिकार की मांग को लेकर एक मंच पर नजर आए. इसी एकजुटता ने कार्यक्रम को आंदोलन का रूप दे दिया.

स्थानीय लोगों का कहना है कि खैरागढ़-छुईखदान-गंडई को मिलाकर जिला बनाना भले ही राजनीतिक उपलब्धि मानी गई हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है. जिला बनने के बाद भी छुईखदान और गंडई में न तो प्रशासनिक सुविधाएं बढ़ीं और न ही विकास की रफ्तार तेज हुई. बड़े कार्यालय, अधिकारी और संसाधन आज भी खैरागढ़ तक सीमित हैं, जबकि बाकी क्षेत्रों को केवल नाम का जिला मिला है.

लोगों का तर्क है कि खैरागढ़, छुईखदान और गंडई तीनों भौगोलिक और सामाजिक रूप से अलग इकाइयां हैं. खैरागढ़ से छुईखदान की दूरी करीब 15 किलोमीटर है, जबकि गंडई और भी दूर स्थित है. ऐसे में एक ही प्रशासनिक ढांचे में तीनों को बांधना शुरू से ही अव्यवहारिक रहा है. प्रशासन तक पहुंच कठिन है और विकास कार्य सुस्त गति से चल रहे हैं.

इसी नाराजगी ने अब एक स्पष्ट मांग का रूप ले लिया है. छुईखदान के लोगों का कहना है कि यदि जिले के नाम से उनका नाम हटाया जाता है तो भी उन्हें आपत्ति नहीं, लेकिन उनकी पहचान और आवाज खत्म नहीं होनी चाहिए. विधानसभा का दर्जा मिलने से ही क्षेत्र की समस्याएं सीधे विधानसभा तक पहुंचेंगी और यही छुईखदान की सबसे बड़ी जरूरत है.

1953 में अधिकारों के लिए शहादत देने वाले शहीदों की स्मृति में जले दीयों ने आज नई पीढ़ी को संघर्ष के लिए खड़ा कर दिया है. मंच से यह संदेश भी साफ दिया गया कि यह लड़ाई किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था की अनदेखी के खिलाफ है. लोगों ने चेतावनी दी कि अब छुईखदान सिर्फ आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगा और यदि उसकी आवाज नहीं सुनी गई, तो यह शांत रोशनी जल्द ही एक बड़े आंदोलन में बदल सकती है.