रूस और अमेरिका के बीच रणनीतिक परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली आखिरी बड़ी संधि न्यू स्टार्ट (New Strategic Arms Reduction Treaty) की अवधि आज यानी 5 फरवरी 2026 को समाप्त हो गई। इसके साथ ही करीब 50 साल बाद पहली बार दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों पर अपने रणनीतिक परमाणु हथियारों को लेकर कोई कानूनी बाध्यता या नियंत्रण नहीं बचा है। न्यू स्टार्ट के खत्म होने से अब अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM), पनडुब्बियों से लॉन्च होने वाली मिसाइलों (SLBM) और परमाणु बॉम्बरों पर तैनात हथियारों की संख्या को लेकर कोई तय सीमा नहीं रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे दुनिया में नई परमाणु हथियारों की होड़ शुरू होने का खतरा काफी बढ़ गया है।

न्यू स्टार्ट संधि क्या है?

न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी (New START) परमाणु हथियारों की बढ़ती होड़ को रोकने के लिए वर्ष 2010 में किया गया एक ऐतिहासिक समझौता था। इस संधि पर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद यह संधि 2011 में औपचारिक रूप से लागू हुई। न्यू स्टार्ट का मुख्य उद्देश्य उन रणनीतिक परमाणु हथियारों की तैनाती को सीमित करना था, जो किसी देश के प्रमुख राजनीतिक, सैन्य और औद्योगिक ठिकानों को निशाना बनाने में सक्षम होते हैं। इनमें अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM), पनडुब्बियों से लॉन्च की जाने वाली मिसाइलें (SLBM) और परमाणु हथियार ले जाने वाले बॉम्बर शामिल थे। संधि के तहत केवल उन्हीं हथियारों को गिनती में शामिल किया जाता था, जो तैनात (Deployed) स्थिति में हों, यानी जो सक्रिय सेवा में हों और जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल किए जा सकें।

संधि कैसे बनी? पूरी कहानी

परमाणु हथियारों पर रोक लगाने की कोशिशें शीत युद्ध के दौर से ही चलती आ रही हैं। वर्ष 1969 से अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ (बाद में रूस) के बीच हथियार नियंत्रण को लेकर कई चरणों में बातचीत और समझौते हुए, जिनका मकसद परमाणु टकराव के खतरे को कम करना था।

1970 का दशक: SALT समझौते

परमाणु हथियार नियंत्रण की दिशा में पहला बड़ा कदम SALT (Strategic Arms Limitation Talks) के रूप में सामने आया। इन समझौतों के तहत हथियारों की संख्या पर सीमा तो लगाई गई, लेकिन वास्तविक कटौती नहीं की गई। इसका उद्देश्य हथियारों की बेलगाम बढ़ोतरी को रोकना था।

1991: START I

शीत युद्ध के अंत के साथ START I को बड़ी सफलता माना गया। यह संधि अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश सीनियर और सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव के कार्यकाल में हुई। इसके तहत हजारों रणनीतिक परमाणु हथियारों में कटौती की गई, जो हथियार नियंत्रण के इतिहास में पहली बड़ी कमी थी।

1993: START II

इसके बाद START II पर सहमति बनी, जिसका मकसद और गहरी कटौती करना था। हालांकि, यह संधि पूरी तरह लागू नहीं हो सकी, लेकिन इसने भविष्य के समझौतों की जमीन तैयार की।

2002: SORT (मॉस्को संधि)

साल 2002 में अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जूनियर और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच SORT, जिसे मॉस्को संधि भी कहा जाता है, पर सहमति बनी। इसके तहत दोनों देशों ने तैनात परमाणु वारहेड्स की संख्या 1,700 से 2,200 के बीच सीमित करने का फैसला किया। हालांकि, इस संधि में निरीक्षण और जांच-पड़ताल की व्यवस्था कमजोर मानी गई।

2021 के बाद क्या हुआ?

न्यू स्टार्ट संधि की प्रभावशीलता को 2023 में ही बड़ा झटका लग चुका था, जब रूस ने इसमें अपनी भागीदारी निलंबित (suspend) करने का ऐलान किया था। रूस ने उस समय संधि के तहत होने वाले निरीक्षण और आपसी जांच की प्रक्रिया को रोक दिया था। हालांकि, मॉस्को ने यह दावा जारी रखा कि वह संधि में तय की गई हथियारों की सीमाओं का पालन करता रहेगा।

रूस ने इसके पीछे वजह बताई थी कि यूक्रेन युद्ध में अमेरिका की सक्रिय भूमिका और सैन्य मदद संधि की भावना के खिलाफ है। रूसी नेतृत्व का तर्क था कि ऐसे हालात में अमेरिका के साथ पारदर्शिता और निरीक्षण की व्यवस्था बनाए रखना संभव नहीं है। इसके बावजूद न्यू स्टार्ट कानूनी रूप से लागू रही, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह संधि लगभग निष्क्रिय हो चुकी थी। अब 5 फरवरी 2026 को इसकी अवधि समाप्त होते ही यह संधि पूरी तरह खत्म हो गई है।

रूस बोला- अब परमाणु हथियारों की सीमा से मुक्त

रूस ने कहा है कि वह अब अमेरिका के साथ रणनीतिक परमाणु हथियारों की संख्या को सीमित करने वाली न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी (New START) से बंधा नहीं है, क्योंकि यह संधि गुरुवार, 5 फरवरी 2026 को समाप्त हो रही है। रूस के इस बयान से वैश्विक सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं और बढ़ गई हैं। इस घटनाक्रम पर संयुक्त राष्ट्र ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। संयुक्त राष्ट्र ने न्यू स्टार्ट के समाप्त होने को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए एक “गंभीर क्षण” करार दिया है। रूसी विदेश मंत्रालय ने बुधवार को जारी बयान में कहा कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका के सामने यह प्रस्ताव रखा था कि दोनों देश कम से कम 12 महीनों तक स्वेच्छा से न्यू स्टार्ट संधि के तहत तय मिसाइलों और तैनात परमाणु वारहेड्स की सीमाओं का पालन जारी रखें। हालांकि, रूस का दावा है कि अमेरिका ने इस प्रस्ताव पर कोई जवाब नहीं दिया। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “हम मानते हैं कि न्यू स्टार्ट संधि के पक्षकार अब इसके तहत किसी भी दायित्व या पारस्परिक घोषणाओं से बंधे नहीं हैं। हमारी बातों को जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है, जो गलत और अफसोसजनक है।”

संधि खत्म होने के संभावित असर

न्यू स्टार्ट संधि की अवधि समाप्त होने के साथ ही रूस और अमेरिका दोनों के लिए मिसाइलों की संख्या बढ़ाने और सैकड़ों अतिरिक्त रणनीतिक परमाणु वारहेड्स तैनात करने का कानूनी रास्ता खुल गया है। अब दोनों देशों पर रणनीतिक हथियारों को लेकर कोई बाध्यकारी सीमा लागू नहीं रहेगी। हालांकि, परमाणु हथियार विशेषज्ञों का कहना है कि हथियारों की संख्या को तेजी से बढ़ा पाना तकनीकी और लॉजिस्टिक रूप से आसान नहीं है। नई मिसाइलों का निर्माण, अतिरिक्त वारहेड्स की तैनाती, पनडुब्बियों और बॉम्बरों में बदलाव जैसे कदमों में काफी समय और संसाधन लगेंगे। इसलिए तत्काल बड़े पैमाने पर परमाणु विस्तार की संभावना कम मानी जा रही है, लेकिन मध्यम और लंबी अवधि में खतरे बढ़ सकते हैं।

परमाणु हथियारों का मौजूदा संतुलन

रूस और अमेरिका मिलकर दुनिया के 90 प्रतिशत से अधिक परमाणु हथियारों का भंडार रखते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2025 तक रूस के पास करीब 4,309 परमाणु वारहेड्स थे, अमेरिका के पास लगभग 3,700 परमाणु वारहेड्स मौजूद थे, अन्य परमाणु संपन्न देशों की तुलना में यह संख्या कहीं अधिक है। फ्रांस के पास करीब 290, ब्रिटेन के पास लगभग 225, जबकि चीन के पास करीब 600 परमाणु हथियार माने जाते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे में न्यू स्टार्ट जैसी संधि का खत्म होना वैश्विक परमाणु संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

विशेषज्ञों की चेतावनी: हथियारों की नई होड़ का खतरा

सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि न्यू स्टार्ट के समाप्त होने से नई हथियारों की दौड़ शुरू हो सकती है, जिसमें चीन के तेजी से बढ़ते परमाणु भंडार का भी सीधा असर पड़ेगा। उनका मानना है कि यदि अमेरिका और रूस हथियार नियंत्रण के दायरे से बाहर रहते हैं, तो अन्य परमाणु शक्तियां भी अपने भंडार बढ़ाने की दिशा में कदम उठा सकती हैं। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के वरिष्ठ विशेषज्ञ मैट कोर्डा के अनुसार, सबसे खराब स्थिति में अमेरिका और रूस दोनों अपनी तैनात परमाणु क्षमताओं को लगभग दोगुना कर सकते हैं। इससे न सिर्फ रणनीतिक स्थिरता कमजोर होगी, बल्कि परमाणु टकराव या दुर्घटना का जोखिम भी कई गुना बढ़ सकता है।

पोप लियो ने भी चेताया

संधि की समाप्ति से पहले पोप लियो ने रूस और अमेरिका से अपील की कि वे हथियारों पर लगी सीमाओं को समाप्त न करें और भय व अविश्वास की राजनीति छोड़कर साझा वैश्विक हितों को प्राथमिकता दें। वहीं संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने चेतावनी दी कि आधी सदी से अधिक समय में पहली बार दुनिया ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है, जब रूस और अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु शक्तियां किसी भी बाध्यकारी परमाणु सीमा के बिना होंगे। गुतारेस ने कहा कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का खतरा दशकों में सबसे अधिक है और दोनों देशों से नई, सत्यापनीय और जोखिम कम करने वाली संधि पर तुरंत बातचीत शुरू करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि अब दुनिया रूस और अमेरिका से ठोस कार्रवाई की उम्मीद कर रही है, ताकि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।

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