कुमार इंदर, जबलपुर। संस्कारधानी जबलपुर के वंदन पुनर्वास एवं अनुसंधान संस्थान से आई ये तस्वीरें सिर्फ त्योहार की तैयारी नहीं हैं, बल्कि हौसलों की एक जीती-जागती मिसाल हैं। यहां मिट्टी से आकार लेते ये दीये केवल माटी के दीपे नहीं हैं, ये इन दिव्यांग बच्चों की आत्मनिर्भरता, मेहनत और स्वाभिमान का वो उजाला हैं, जो इस दीपावली हर घर को एक नया पैगाम देगा।


मिट्टी को तराशते ये नन्हे हाथ… जब कोई मिट्टी का दिया ख़ूबसूरत आकर में सजता है, तो इन बच्चों के चेहरों पर चमक उठ जाती है, एक अनमोल मुस्कान बिखर जाती है। कोई मिट्टी को आकार दे रहा है, तो कोई बड़ी बारीकी और लगन से उसमें रंग भर रहा है। कुदरत ने भले ही इन्हें कुछ शारीरिक बंदिशें दी हों, लेकिन इनके सपनों की उड़ान और हुनर के आगे हर चुनौती छोटी पड़ गई है। वंदन संस्था का यह प्रांगण इस वक्त सिर्फ दीयों से नहीं, बल्कि इन बच्चों के अटूट आत्मविश्वास से जगमगा रहा है।



दरअसल, असली दीपावली सिर्फ मिट्टी का दीया जला देने में नहीं, बल्कि किसी के जीवन में उम्मीद का पहला चिराग रोशन करने में है। इन बच्चों के हाथों से बने ये दीये जब आपके और हमारे घरों की देहलीज पर जलेंगे, तो सिर्फ आँगन नहीं चमकेगा, बल्कि इन मासूमों के आत्मनिर्भर बनने का सपना भी साकार होगा। यह कोशिश समाज को याद दिलाती है कि अगर सही अवसर और थोड़ा सा संबल मिले, तो कोई भी कमी हुनर के रास्ते की रुकावट नहीं बन सकती।



अंधेरा कितना भी गहरा हो, उम्मीद की एक लौ उसे मिटाने के लिए काफ़ी होती है। जबलपुर के इन बच्चों ने साबित कर दिखाया है कि हौसले अगर बुलंद हों, तो हर मुश्किल राह आसान हो जाती है। इस बार जब आप अपने घरों में दीये जलाएँ, तो इन नन्हे हाथों की मेहनत और इनके स्वाभिमान को अपने दिल में जगह ज़रूर दें… क्योंकि असली उजाला वही है जो किसी के जीवन से अंधेरा मिटा सके।

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