‘उद्योग’ शब्द को लेकर एक बार फिर देश की शीर्ष अदालत में याचिका दायर हुई है. इस बार सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इसे सुना है और अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. यह सुनवाई स्टेट ऑफ यूपी बनाम जय वीर सिंह मामले में हुई है. उधर उद्योग को लेकर एक अन्य केस में सर्वोच्च अदालत की दो न्यायाधीशों जस्टिस अरविन्द कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने स्पष्ट किया कि मंदिर ट्रस्ट उद्योग नहीं हैं. इस आधार पर सर्वोच्च अदालत ने एक एकाउंटेंट की बर्खास्तगी को वैध करार दिया लेकिन उसे 12 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश भी दिया.
क्या है मंदिर ट्रस्ट के कर्मचारी की बर्खास्तगी का मामला ?
पूरा मामला साल 1977 का है जब गुजरात से. लक्ष्मी नारायण देव ट्रस्ट में एक एकाउंटेंट की नियुक्ति होती है. वे लगातार सेवा देते हैं. लेकिन कुछ सालों बाद बिना किसी ठोस कारण के कर्मचारी को ट्रस्ट बर्खास्त कर देता है. जब कर्मचारी ने फिर से नियुक्ति का अनुरोध किया तो उसे ट्रस्ट ने अनसुना किया. मामला पहले श्रम न्यायालय पहुंचा. अदालत ने यह केस इस तर्क के साथ खारिज कर दिया कि प्रतिवादी ट्रस्ट धार्मिक गतिविधियां संचालित करता है. श्रम अदालत ने कहा कि ट्रस्ट औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत नहीं आता है. श्रम न्यायालय के इस फैसले को गुजरात हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच और फिर खंडपीठ ने भी बरकरार रखा.
तब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. यहां न्यायाधीश गण ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया. बल्कि यह भी कहा कि मंदिर ट्रस्ट उद्योग की परिधि में नहीं आते. हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने मानवीय आधार पर वर्षों तक ट्रस्ट की सेवा करने के एवज में आदेश दिया कि ट्रस्ट 12 लाख रुपए एकमुश्त भुगतान करे. ऐसा न करने पर नौ फीसदी ब्याज भी देना होगा. सर्वोच्च अदालत ने यह फैसला पिछले महीने सुनाया.
तो फिर नौ न्यायाधीशों की बेंच क्यों बनी?
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्वनी कुमार दुबे बताते हैं कि उद्योग को परिभाषित करने के अनुरोध के साथ स्टेट ऑफ यूपी बनाम जय वीर सिंह का एक मामला साल 2005 में सर्वोच्च अदालत के सामने आया. चूंकि, इसी मसले पर साल 1978 में सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की बेंच ने उद्योग को परिभाषित किया था, ऐसे में इस मामले को सुनने के लिए नौ न्यायाधीशों के बेंच की जरूरत पड़ी. वह कहते हैं कि साल 1978 से अब तक के सालों में बहुत कुछ बदल चुका है. ऐसे में जरूरी था कि उद्योग की परिभाषा नए सिरे से तय हो. इसी इरादे से सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई पूरी कर ली है. फैसला सुरक्षित है. जब भी यह फैसला आएगा, उद्योग की नई परिभाषा देश के सामने होगी.
कारखानों तक सीमित नहीं है उद्योग
बता दें कि, भारत में उद्योग शब्द का बहुत महत्व है. यह केवल कारखानों तक सीमित नहीं है. यह रोजगार, उत्पादन और सेवाओं से जुड़ा एक व्यापक शब्द है. उद्योग देश की अर्थव्यवस्था का आधार है इसलिए इसकी कानूनी परिभाषा भी स्पष्ट की गई है. विशेष रूप से औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में इसे परिभाषित किया गया है. साल 1978 में इस परिभाषा को और विस्तार दिया गया. अब देखना और जानना रोचक होगा कि सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ उद्योग शब्द को नए सिरे से कैसे परिभाषित करती है?
क्या है उद्योग का सामान्य अर्थ?
किसी वस्तु या सेवा का संगठित रूप से उत्पादन करना या सेवा देना, उद्योग का सामान्य अर्थ है. जब लोग मिलकर नियमित रूप से काम करते हैं और बदले में पारिश्रमिक पाते हैं, तो वह गतिविधि उद्योग कहलाती है. उद्योग में तीन प्रमुख कारक शामिल हैं. संगठित गतिविधि, नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध और वस्तु या सेवा का उत्पादन या वितरण.
साल 1947 में क्या तय की गई उद्योग की परिभाषा?
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 भारत में श्रम कानून का एक महत्वपूर्ण कानून है. आजाद भारत में इस कानून का उद्देश्य नियोक्ता और कर्मचारी के बीच विवादों को सुलझाना है. इस अधिनियम की धारा 2(ज) में उद्योग की परिभाषा भी दी गई है. इसके मुताबिक कोई भी संगठित गतिविधि जो नियोक्ता और कर्मचारियों के सहयोग से चलाई जाती हो, जिसका उद्देश्य वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन, आपूर्ति या वितरण करना हो, चाहे लाभ कमाने का उद्देश्य हो या न हो. उद्योग की श्रेणी में आएंगे.
यह कानून कहता है कि उद्योग में लाभ कमाना आवश्यक नहीं है. यह निजी या सरकारी, दोनों प्रकार का हो सकता है. सेवा क्षेत्र भी उद्योग में शामिल हो सकता है. अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान आदि भी कुछ परिस्थितियों में उद्योग माने जा सकते हैं. साल 1947 के कानून में कुछ गतिविधियों को इससे बाहर रखा गया है. इसमें खेती, सशस्त्र बल, घरेलू सेवा, संप्रभु कार्य जैसे पुलिस और न्यायपालिका आदि.
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