पाकिस्तान में आतंकी संगठन अब पूरी तरह आउट ऑफ कंट्रोल होते नजर आ रहे हैं. हालात ऐसे हैं कि आतंक के ये सरगना अब न तो आईएसआई की सुन रहे हैं और न ही सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की. आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का एक वरिष्ठ कमांडर अब खुलेआम पाकिस्तान सरकार पर निशाना साध रहा है. हाल ही में एक सार्वजनिक जलसे के दौरान लश्कर-ए-तैयबा के सीनियर कमांडर मोहम्मद राना अशफाक ने खुले मंच से पाकिस्तान सरकार पर तीखा हमला बोला. उसने पंजाब की हालत की तुलना बलूचिस्तान की बदहाली से करते हुए सरकार को सीधे तौर पर ‘चोर’ तक कह डाला. लश्कर-ए-तैयबा सरकार के विरोध में उगा कोई बागी संगठन नहीं, बल्कि पाकिस्तान के कर्ताधर्ताओं की ही पैदाइश है.

इस्लामाबाद के लिए गंभीर चेतावनी

किसी लश्कर कमांडर का इस तरह बिना किसी डर के घरेलू राजनीति पर बोलना पाकिस्तान की आंतरिक हालत और सत्ता के कमजोर होते नियंत्रण की ओर साफ इशारा करता है. लश्कर-ए-तैयबा के ट्रेनिंग कैंप, विचारधारा और ढांचा सीधे तौर पर पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान, खासकर सेना, की देन रहे हैं, जिसने इसे भारत के खिलाफ एक सस्ते रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया. ऐसे संगठन का अपने ही आकाओं पर सार्वजनिक हमला करना इस्लामाबाद के लिए गंभीर चेतावनी है. लश्कर का यह आतंकी पाकिस्तान की कर्ज पर टिकी अर्थव्यवस्था की भी पोल खोलता नजर आया.

दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं जिससे पाकिस्तान ने कर्ज न लिया हो

उसने कहा, ‘पाकिस्तान शायद ही दुनिया का कोई ऐसा देश बचा हो, जिससे पाकिस्तान ने कर्ज न लिया हो. अमेरिका, चीन, सऊदी अरब, यूएई, मलेशिया से लेकर वर्ल्ड बैंक और IMF तक, हर जगह से उधार लेने के बावजूद देश के हालात बद से बदतर हैं. पाकिस्तान में पैदा होने वाला हर बच्चा लाखों के कर्ज़ का बोझ लेकर जन्म ले रहा है. अगर यह पैसा देश के भीतर लगाया गया होता, तो पाकिस्तान आज सऊदी अरब, ब्रिटेन या स्पेन से भी ज्यादा विकसित होता.’ आतंकी ने पाकिस्तान की विदेशी कर्ज पर निर्भर अर्थव्यवस्था का भी मजाक उड़ाया.

UN द्वारा घोषित आतंकी संगठन का कमांडर उड़ा रहा पाकिस्तान की खिल्ली

विडंबना यह है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकी संगठन का एक कमांडर अब पाकिस्तान को आर्थिक गुलामी और अपमान पर भाषण दे रहा है. लेकिन यही वह राक्षस है, जिसे पाकिस्तान ने खुद गढ़ा और जो अब सत्ता के शीर्ष पर फैले सड़ांध को उजागर करने से नहीं डर रहा. सालों तक पाकिस्तान के हुक्मरानों को लगता रहा कि वे इन आतंकी संगठनों को पूरी तरह नियंत्रित कर सकते हैं. अब यह भ्रम टूट रहा है. जब अर्थव्यवस्था चरमरा रही हो, जनता का अपनी सरकार से विश्वास उठ चुका हो और आतंकी अपने सरपरस्तों की कमजोरी भांपने लगें, तो वफादारी बोझ बन जाती है.

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