टंट्या मामा का ‘नवगजा पीर’ कनेक्शन
टंट्या मामा का जितना ज़िक्र सियासत में हो रहा है, उससे ज्यादा निमाड़-झाबुआ के आदिवासी इलाकों में जनचर्चाओं का विषय हैं। टंट्या मामा को लेकर जो चर्चाएं सियासत में हो रही हैं, वो चुन-चुन कर की जा रही हैं। सबसे अहम है वह किस्सा जो टंट्या के जन्म के वक्त से जुड़ा है। किवदंति है कि आदिवासी इलाके में आस्था के केंद्र नवगजा पीर की दरगाह पर टंट्या मामा के पिता ने सौगंध ली थी कि उनका बेटा भील जाति की महिलाओं के साथ हुए अपमान का बदला ज़रूर लेगा। नवगजा पीर की दरगाह पर इलाके के आदिवासी और गैर आदिवासियों की घनघोर आस्था है। किवदंति तो यह भी है कि पीर साहब मुसलमानों के साथ भीलों के भी देवता थे। इस जनचर्चा को पर्दे के सामने आने से वक्त पर रोक लिया गया। दरअसल, जब यह किवदंति संघ के सामने प्रस्तुत हुई तो इसे बड़ी सफाई के साथ बिसरा दिया गया। इस टॉप सीक्रेट के मायने समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है।

कांग्रेस का भी ट्रेनिंग प्लान शुरू
कांग्रेस को जो लोग निष्क्रिय समझ रहे हैं, यह सीक्रेट उनके लिए है। दरअसल, कांग्रेस अंदर ही अंदर बेहद एक्टिव चल रही है। सबसे ज्यादा सक्रियता कांग्रेस विचारधारा की ट्रेनिंग देने की है। अंदर की बात यह है कि कांग्रेस इस ट्रेनिंग के नाम पर बीजेपी के तर्कों के जवाब देना सिखा रही है। शहर और गांव स्तर पर 50-50 लोगों की तीन दिन बैठक लेकर ये विशेष ट्रेनिंग दी जा रही है। जनवरी के महीने में प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की ट्रेनिंग है, इसके बाद फरवरी में जिले और ब्लॉक लेवल की ट्रेनिंग शुरू हो जाएगी। खास बात ये है कि पदाधिकारियों को 3 दिन आवासीय परिसर में ठहरकर ट्रेनिंग का हिस्सा बनना होगा। नियम यह भी बना दिया गया है कि चुनाव लड़ने के लिए आवेदन देते वक्त या पदाधिकारी बनने के लिए ये ट्रेनिंग की सर्टिफिकेट प्रस्तुत करना ज़रूरी होगा। मतलब साफ है, आगे वही बढ़ेगा जिसने ट्रेनिंग ली होगी। दिग्विजय सिंह सरकार के वक्त ये सिलसिला सेवादल के जरिए शुरु हुआ था। मजे की बात ये है कि ट्रेनिंग पूरी होने के बावजूद कांग्रेस सरकार से बाहर हो गई थी। देखना यह है कि कमलनाथ इस फार्मूले के जरिए चुनावी वैतरिणी पार कर पाते हैं या नहीं।

कंफ्यूजन का पंचायत चुनाव
ये पंचायत चुनाव पूरी तरह कंफ्यूजन का है। सरकार ने जब अध्यादेश लाकर यह साफ कर दिया कि पिछले पंचायत चुनाव के वक्त के परिसीमन और आरक्षण के जरिए ही चुनाव होंगे तो सरकार ने जिला पंचायत अध्यक्षों के आरक्षण की तारीखों की घोषणा क्यों कर दी? फिर घोषणा ही की थी तो चुनाव आयोग ने फिर से पिछले परिसीमन और आरक्षण से ही पंचायत चुनाव की घोषणा क्यों की? सवाल यह गूंज रहा है कि जिला पंचायत अध्यक्षों के आरक्षण का औचित्य क्या है, जब उसे अध्यादेश लाकर रद्द कर दिया गया है। सारी कवायद से भारी कंफ्यूजन हो रहा है। इस कंफ्यूजन का असर ग्रामीण स्तर पर साफ देखा जा रहा है, चुनव लड़ने की तैयारी करने वाले जो पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने से पहले ही सक्रिय हो चुके थे और घर का पैसा खर्च करने में जुट गए थे, वे सारे दावेदार अब अपनी मुट्ठी बंद करके वेट एंट वॉच की मुद्रा में आ गए हैं। कांग्रेस ने कोर्ट में फच्चर फंसा रखा है, यदि अब कोर्ट ने कोई आदेश दे दिया तो फिर किए कराए पर पानी फिर सकता है।

IPS अफसरों में ज़ोर-आज़माइश
इस वक्त मंत्रालय में सबसे ज्यादा चर्चाएं हैं तो वह पुलिस कमिश्नरी सिस्टम को लेकर है। सरकार के इरादों से साफ हो गया है कि कानून व्यवस्था का अधिकार अब पुलिस अफसरों के हाथ में आ जाएगा। आईएएस अफसर भले ही इसके टालने के लिए चौतरफा जुगाड़ भिड़ाने की कोशिश में जुटे हों। लेकिन आईपीएस अफसरों ने अपनी लॉबिंग शुरू कर दी है। एडीजी और आईजी स्तर के कुछ अफसर प्रदेश के पहले पुलिस कमिश्नर बनने का ऐतिहासिक मौका हासिल करने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि कमिश्नरी भोपाल या इंदौर की मिले। लेकिन किसी भी सूरत में उस कुर्सी पर बैठकर इतिहास में नाम दर्ज कराना है। इसके लिए कई अफसर जुट गए हैं। जो नाम चर्चाओं में हैं उसमें अनुराधा सिंह, योगेश चौधरी, योगेश देशमुख, ए.साई मनोहर, हरिनारायण चारी जैसे कई अफसरों के नाम चर्चाओं में है। लेकिन होगा वही जिसे शिवराज चाहेंगे। क्योंकि इस सिस्टम को लागू करने के बाद इसका अच्छा-बुरा उनके ही पाले में जाएगा।

जब उलटा पड़ गया विधायक का दांव
उपचुनाव की वजह से कांग्रेस के विधायक बने एक नेताजी पीसीसी की दौड़ लगा रहे थे। वजह यह है कि उनकी जिलाध्यक्ष के साथ पटरी नहीं बैठ रही है। वे जगह-जगह जिलाध्यक्ष की शिकायत लेकर पहुंचने लगे। विधायकजी अपना दर्द हर जगह बयां किए लेकिन कमल नाथ की कृपा से जिलाध्यक्ष की कुर्सी सलामत बनी रही। जब विधायक ने कसमसाकर अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए एक युक्ति भिड़ाई। विधायक ने अपनी नाराज़गी जाहिर करने की कोशिश की तो जुबान फिसलने का बहाना बनाया। जब टीवी चैनलों पर उनका बयान बहस का हिस्सा बन गया तो साहब को पता लगा कि जुबान फिसलने वाला दांव उलटा पड़ गया है। उन्हें यह अंदाज़ा भी नहीं रहा कि जुबान पार्टी लाइन के बाहर निकल गई है। हालांकि विधायकजी ने बात संभाल भी ली, लेकिन दांव उलटा पड़ गया। अब मुश्किल यह है कि जिलाध्यक्ष के खिलाफ मुहिम फिर कैसे शुरू की जाए।

दुमछल्ला…
खजुराहो फेस्टिवल बड़ी धूमधाम से शुरू हो रहा है। लेकिन यहीं के एक लोकल दिग्गज इस आयोजन से दूर हैं। सत्ताधारी दल से ताल्लुक रखने वाले इन दिग्गज नेता को आयोजन की दाल में कुछ काला नजर आ रहा है। वैसे, नेताजी का कद इतना बड़ा है कि उनके बिना खजुराहो में आयोजन होने से प्रोटोकॉल का उल्लंघन का आरोप लग सकता है। सीक्रेट यह है कि आयोजन से जुड़े अफसरों को अब तक नेताजी की नाराज़गी की खबर ही नहीं है।

(संदीप भम्मरकर की कलम से)