सुपेबेड़ा पीड़ितों की हक में लड़ाई लड़ने वाले त्रिलोचन को मिली डीकेएस अस्पताल में सरकारी नौकरी, किडनी मरीजों की करेगा देखभाल

पुरुषोत्तम पात्र,गरियाबंद. सुपेबेड़ा में किडनी की बीमारी से अब तक 70 लोगों की मौत होने के बाद नई सरकार जाग गई है. जिससे पीड़ितो को एक नई उम्मीद भी मिली है कि उनका अब भला होगा. स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने इसी सपने को पूरा करने 17 अपने लोगों को गवाने वाले पीड़ित परिवार के त्रिलोचन को डीकेएस अस्पताल में वार्ड बॉय बनाया है जिससे वह डीकेएस अस्पताल में ही रहकर सुपेबेड़ा से आने वाले किडनी मरीजों की देख भाल करे.

जानकारी के मुताबिक 21 फरवरी को त्रिलोचन सोनवानी ने डीकेएस अस्पताल पहुंचकर वार्डबॉय के पद की ज्वाइनिंग ले लिया था, गुरुवार को अस्पताल पहुंचकर विधिवत हाजिरी भी दे दिया है. त्रिलोचन को प्रबंधन की ओर से रहने के लिए आवास व्यवस्था भी उपलब्ध कराया गया है. पिछली सरकार में डीकेएस के डायरेक्टर रहे डॉ पुनित गुप्ता ने वहां सुपेबेड़ा के लिए पृथक वार्ड का प्रावधान किया तो था, लेकिन यहां पहुंचने के बाद हुई अनदेखी के बाद से मरीज इस जगह आने के लिये कतरा रहे है. इसी दूरी को मिटाने सुपेबेड़ा के मरीजो के केयर करने प्रशासन व मरीज के बीच समन्यव की जिम्मेदारी त्रिलोचन को दिया गया है.

नब्ज टटोला था मंत्री ने, उसका उपाय किया

बीते 2 फरवरी को स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव सुपेबेड़ा पहुंचकर मरीजो का नब्ज टटोला था. वे सरकारी इलाज से दूर भागने वाले मरीजों से कारण भी जानने की कोशिश किया था. इसी सभा से मंत्री ने हाथ जोड़कर मरीजों को एक बार डीकेएस अस्पताल आने का आग्रह भी किया था. ताकि उनकी सही इलाज किया जा सके. मंत्री का आग्रह भी बेअसर साबित हुआ. उनके लौटने के महीने भर बाद भी कोई मरीज डीकेएस जाने के लिए राजी नहीं हुए, जबकि गांव में अभी भी 65 मरीज है जिन्हें बेहतर इलाज की आवश्यकता है.

बीएमओ डॉ सुनील भारती ने कहा कि मंत्री जी के निर्देश के बाद पीड़ितों को ले जाने के काफी प्रयास किए गए. मरीज राजी नहीं हुए, वे डीकेएस अस्पताल या रायपुर जा कर इलाज नहीं कराएंगे. इसकी लिखित पत्र दे दिया है. जिसे जिला अधिकारियों को अवगत कराया गया था.

परिवार में 17 लोगों की गई जान

3 साल पहले तक किडनी की बीमारी से त्रिलोचन सोनवानी के पिता समेत उसके चाचा चाची व अन्य सदस्य समेत 13 लोगों किडनी की बीमारी से मृत हुए थे. तब रायपुर में निजी कम्पनी की 18 हजार की नौकरी छोड़कर त्रिलोचन गांव पहुंच पीड़ितों के लिए लड़ाई लड़ना शूरू कर दिया. मीडिया के सहयोग के बाद उसकी लड़ाई रंग भी लाने लगी. इन तीन साल में उसके परिवार के 4 और सदस्य ने जान गवा दिया. गांव में 2005 से अब तक 70 लोगों की मौत हो चुकी है, 264 बीमार हैं. इसे रोकने व बेहतर इलाज करने शासन ने त्रिलोचन को सेतू की भूमिका निभाने की जिम्मेदारी दिया है.

संघर्ष की कहानी सून मंत्री ने गले लगा लिया था

2 फरवरी को मंत्री सिंहदेव सुपेबेड़ा आने से पहले त्रिलोचन को राजधानी बुलवा लिया था. 1 की देर रात त्रिलोचन की उपस्थिति में अफसरो ने गांव का फीडबैक लिया था. गांव पहुंचने के बाद जब ग्रामीणों ने सरकारी इलाज के कड़वा अनुभव को ग्रामीणों से ही सुना, तभी इन्होंने कुछ बेहतर करने की सोच लिया था. तय कार्यक्रम के मुताबिक सोनवानी को छोड़कर जाना था, पर मंत्री वापसी में दोबारा उसे अपने साथ के गए. तब उन्होंने और बारीकी से जानकारी जुटाई थी. त्रिलोचन के संघर्ष की कहानी सुनकर सिंहदेव ने उसे सीने से लगा लिया था.

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