प्रदीप मालवीय, उज्जैन। विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में आज से भगवान महाकाल पर सतत जलाभिषेक की परंपरा शुरू हो गई है। यह जलधारा 29 जून तक लगातार जारी रहेगी। मंदिर में 11 मिट्टी के कलशों के माध्यम से “गलंतिका” स्थापित की गई है, जिससे भगवान महाकाल पर निरंतर जल अर्पित किया जा रहा है।

इन कलशों में गंगा नदी, यमुना नदी, नर्मदा नदी, गोदावरी नदी, कावेरी नदी, सरस्वती नदी, सिंधु नदी, सरयू नदी, क्षिप्रा नदी और गण्डकी नदी सहित पवित्र नदियों का स्मरण कर जल स्थापित किया गया है। यह जलाभिषेक प्रतिदिन सुबह भस्म आरती के बाद शुरू होकर शाम की पूजा तक चलता रहेगा।

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इस वर्ष ज्येष्ठ माह में अधिकमास (पुरुषोत्तम मास) होने के कारण यह परंपरा एक महीने अतिरिक्त चलेगी, यानी कुल तीन माह तक बाबा महाकाल पर शीतल जलधारा अर्पित की जाएगी। इस दौरान श्रद्धालु बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचकर बाबा महाकाल के दर्शन कर पुण्य लाभ ले रहे है।

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पुजारी ने बताई वजह

महाकाल मंदिर के पुजारी महेश शर्मा ने बताया कि इस परंपरा को गलंतिका कहा जाता है। मिट्टी की पात्र होती है, जिसे भगवान के ऊपर दो महीने तक चढ़ाई जाती है। वैशाख (अप्रैल-मई) और ज्येष्ठ (मई-जून) में गर्मी ज्यादा रहती है, इसलिए यह जल की धारा चढ़ाई जाती है। 11 मटकियां लगाई जाती है। जब भी जल चढ़ाया जाता है तो एक मंत्र बोला जाता है। जिसमें सभी पवित्र नदियों का स्मरण हो जाता हैं। यह परंपरा दो महीने तक चलती है, लेकिन मंदिर समिति ने इस पर चर्चा की तो एक मास आगे भी बढ़ सकता है।

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